Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1249

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ हि शश्व꣢꣯तीना꣣मि꣡न्द्र꣢ ध꣣र्त्ता꣢ पु꣣रा꣡मसि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢꣫ दस्यो꣣र्म꣡नो꣢र्वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥

त्वम् । हि । श꣡श्व꣢꣯तीनाम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । ध꣣र्त्ता꣢ । पु꣣रा꣢म् । अ꣡सि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢ । द꣡स्योः꣢꣯ । म꣡नोः꣢꣯ । वृ꣡धः꣢꣯ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥

Mantra without Swara
त्वꣳ हि शश्वतीनामिन्द्र धर्त्ता पुरामसि । हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः ॥

त्वम् । हि । शश्वतीनाम् । इन्द्र । धर्त्ता । पुराम् । असि । हन्ता । दस्योः । मनोः । वृधः । पतिः । दिवः ॥१२४९॥

Samveda - Mantra Number : 1249
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे वृष्टिहेतो ! वायुविशेष ! (त्वं हि) तू ही (शश्वतीनाम्) बहुत पुरानी (पुराम्) नगरियों का (धर्त्ता) फाड़ने वाला (दस्योः) असुर मेघ का (हन्ता) हनन करने वाला और (मनोः) यज्ञशील मनुष्य का (वृधः) बढ़ाने वाला (असि) है जो कि (दिवः पतिः) आकाश का पति है॥
वायुभेद जो इन्द्र कहाता है उससे ही वर्षा होती हैं, इसलिये सोमादि ओषधि द्वारा यज्ञ करने से उसका आप्यायन, उससे वर्षा, उनसे पुरानी भित्ति आदि गिर जाने से पुरों का भेदन और यज्ञ करने वाले मनुष्यों के धान्यादि बढ़ने से उन की वृद्धि होती है॥
Footnote
ऋ० ८। ९८। ६ में भी॥