Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1248

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ हि स꣢꣯त्य सोमपा उ꣣भे꣢ ब꣣भू꣢थ꣣ रो꣡द꣢सी । इ꣡न्द्रासि꣢꣯ सुन्व꣣तो꣢ वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣡ ॥१२४८॥

अ꣣भि꣢ । हि । स꣣त्य । सोमपाः । सोम । पाः । उभे꣡इति꣢ । ब꣣भू꣡थ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣡सि꣢꣯ । सु꣣न्वतः꣢ । वृ꣣धः꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४८॥

Mantra without Swara
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी । इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः ॥

अभि । हि । सत्य । सोमपाः । सोम । पाः । उभेइति । बभूथ । रोदसीइति । इन्द्र । असि । सुन्वतः । वृधः । पतिः । दिवः ॥१२४८॥

Samveda - Mantra Number : 1248
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सत्य ! सोमपाः ! इन्द्र !) हे सच्चे सोम पीने वाले इन्द्र (हि) निश्चय तू (उभे) दोनों (रोदसी) द्युलोक और पृथिवीलोक को (अभिबभूथ) दबा कर वर्त्तमान है, सो तू (सुन्वतः) सोमयाजी यजमान का (वृधः) बढ़ाने वाला और (दिवः) आकाश का (पतिः) पालक (असि) है।
तात्पर्य यह है कि आकाशगत वायुविशेष वृष्टि के हेतु इन्द्र के यज्ञ द्वारा यजन करने से यज्ञ करने वालों की वृद्धि होती है क्योंकि वह प्राकाशगत सब प्राण और अप्राणियों का पालक और वर्धक है।
Footnote
ऋ० ८। ९८। ५ में भी॥