Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1246

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं꣡ य꣢विष्ठ दा꣣शु꣢षो꣣ नॄ꣡ꣳपा꣢हि शृणु꣣ही꣡ गिरः꣢꣯ । र꣡क्षा꣢ तो꣣क꣢मु꣣त꣡ त्मना꣢꣯ ॥१२४६॥

त्वम् । य꣣विष्ठ । दाशु꣡षः꣢ । नॄन् । पा꣣हि । शृणुहि꣢ । गि꣡रः꣢꣯ । र꣡क्ष꣢꣯ । तो꣣क꣢म् । उ꣣त꣢ । त्म꣡ना꣢꣯ ॥१२४६॥

Mantra without Swara
त्वं यविष्ठ दाशुषो नॄꣳपाहि शृणुही गिरः । रक्षा तोकमुत त्मना ॥

त्वम् । यविष्ठ । दाशुषः । नॄन् । पाहि । शृणुहि । गिरः । रक्ष । तोकम् । उत । त्मना ॥१२४६॥

Samveda - Mantra Number : 1246
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यविष्ठ) हे अतिबलवत्तम ! ईश्वर ! (दाशुषः) दानादि से परोपकाररत (नृन्) मनुष्यों की (पाहि) रक्षा कीजिये, (गिरः) उन की स्तुतियों को (शृणुहि) सुनिये (उत) और (तोकम्) उनके पुत्रादि सन्तान वर्ग की (त्मना) अपने अनन्तसामर्थ्य से (रक्ष) रक्षा कीजिये॥
भौतिक पक्ष में: — (यविष्ठ) अति बलवान् अग्नि (दाशुषः) हव्यदान से होम करने वाले (नृन्) कर्म के नेता कर्मकाण्डियों की रक्षा करता है और (गिरः) उनकी वाणियों को सुनाता अर्थात् जैसा-जैसा वे चाहते हैं वैसा-वैसा उत्तम काम उनका पूर्ण करता है और उनके सन्तानों की भी रक्षा करता है॥
तात्पर्य यह है कि जो लोग नित्यप्रति होम से वायु आदि देवों को हव्य देकर अग्निदूत के द्वारा तृप्त करते हैं, उनकी कराई तृप्ति से प्रसन्न हुए वे वायु आदि भौतिक देवता उनकी और उनके सन्तानों की आयु की रक्षा करते तथा सब प्रकार उनकी कामना पूरी करते हैं।
Footnote
ऋ० ८। ८४। ३ में भी॥