Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 124

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣दं꣡ व꣢सो सु꣣त꣢꣫मन्धः꣣ पि꣢बा꣣ सु꣡पू꣢र्णमु꣣द꣡र꣢म् । अ꣡ना꣢भयिन्ररि꣣मा꣡ ते꣢ ॥१२४॥

इ꣣द꣢म् । व꣣सो । सुत꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ । सु꣡पू꣢꣯र्णम् । सु । पू꣣र्णम् । उद꣡र꣢म् । उ꣣ । द꣡र꣢꣯म् । अ꣡ना꣢꣯भयिन् । अन् । आ꣣भयिन् । ररिम꣢ । ते꣣ ॥१२४॥

Mantra without Swara
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन्ररिमा ते ॥

इदम् । वसो । सुतम् । अन्धः । पिब । सुपूर्णम् । सु । पूर्णम् । उदरम् । उ । दरम् । अनाभयिन् । अन् । आभयिन् । ररिम । ते ॥१२४॥

Samveda - Mantra Number : 124
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वसो) वसाने वाले ! (अनाभयिन्) भयरहित ! इन्द्र ! (इदम्) यह (सुतम्) सम्पादित (अन्धः) सोमाख्य अन्न (ते) तेरे लिये (ररिम्) देते हैं [उसे तुम] (सूपूर्णम्, उदरम्) भर पेट (पिब) छको॥
पूर्वमन्त्र में कह आये हैं कि शूर वीर इन्द्र के लिये सोम पहुँचाओ। इस मन्त्र में उसके देने का वचन बताया गया है कि ऐसा कहकर देना चाहिये। इन्द्र के राजार्थ में तो स्पष्ट ही है, परन्तु देवविशेष अर्थ में उदरस्थानी अन्तरिक्ष समझना चाहिए। पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव ने दीर्घ विधायक सूत्रों को न जानकर “पिब, आ, ररिम, आ” यह पदपाठ के विरुद्ध पदच्छेद करके व्याख्या की है। तथा “अनुदरम्” यह मूल के भी विरुद्ध व्याख्यात किया है।
Footnote
निघण्टु २। ७ अष्टाध्यायी ३।४।६॥ ६।३।१३७॥ ऋ० ८।२।१॥ १०॥