Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1230

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢स्य सोम꣣ प꣡व꣢मान ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ तवि꣣ष्य꣡मा꣢णो ज꣣ठ꣢रे꣣ष्वा꣡ वि꣢श । प्र꣡ नः꣢ पिन्व वि꣣द्यु꣢द꣣भ्रे꣢व꣣ रो꣡द꣢सी धि꣣या꣢ नो꣣ वा꣢जा꣣ꣳ उ꣡प꣢ माहि꣣ श꣡श्व꣢तः ॥१२३०॥

इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । सो꣣म । प꣡वमा꣢꣯नः । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । त꣣विष्य꣡मा꣢णः । ज꣣ठ꣡रे꣢षु । आ । वि꣣श । प्र꣢ । नः꣣ । पिन्व । विद्यु꣢त् । वि꣣ । द्यु꣢त् । अ꣣भ्रा꣢ । इ꣣व । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । धि꣣या꣢ । नः꣣ । वा꣡जा꣢꣯न् । उ꣡प꣢꣯ । मा꣣हि । श꣡श्व꣢꣯तः ॥१२३०॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य सोम पवमान ऊर्मिणा तविष्यमाणो जठरेष्वा विश । प्र नः पिन्व विद्युदभ्रेव रोदसी धिया नो वाजाꣳ उप माहि शश्वतः ॥

इन्द्रस्य । सोम । पवमानः । ऊर्मिणा । तविष्यमाणः । जठरेषु । आ । विश । प्र । नः । पिन्व । विद्युत् । वि । द्युत् । अभ्रा । इव । रोदसीइति । धिया । नः । वाजान् । उप । माहि । शश्वतः ॥१२३०॥

Samveda - Mantra Number : 1230
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे (पवमान) शोध्यमान ! (सोम) सोम ! तू (तविष्यमाणः) वृद्धि को प्राप्त होवेगा सो (इन्द्रस्य) वायुविशेष इन्द्र के (जठरेषु) पेटों में (ऊर्मिणा) लहरी द्वारा (आविश) प्रवेश कर (इव) जैसे कि (विद्युत) बिजुली (अभ्रा) बादलों में प्रवेश करती है और (रोदसी) द्युलोक और पृथिवी लोक को (प्र—पिन्व) दुह अर्थात् वृष्टि तथा खेती को सम्पन्न कर और (धिया) यज्ञ कर्म से (नः) हमारे लिये (शश्वतः) बहुत (वाजान्) अन्न, धन, बल आदि पदार्थों को (उप—माहि) प्राप्त करा॥
यदि इन्द्र कोई देहधारी विशेष विवक्षित होता तो १ इन्द्र का एक ही जठर = पेट होता, यहां “जठरेषु” इस बहुवचन से स्पष्ट होता है कि आकाशप्रदेश जिस में से वर्षा होती है, बहुत हैं, और इसलिये उसको इन्द्र का जठर = उदर मानकर बहुवचन प्रयुक्त किया है॥
Footnote
ऋ० ९। ७६। ३ के पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥