Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 123

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡न्यं꣢पन्य꣣मि꣡त्सो꣢तार꣣ आ꣡ धा꣢वत꣣ म꣡द्या꣢य । सो꣡मं꣢ वी꣣रा꣢य꣣ शू꣡रा꣢य ॥१२३॥

प꣡न्य꣢꣯म्पन्यम् । प꣡न्य꣢꣯म् । प꣣न्यम् । इ꣢त् । सो꣣तारः । आ꣢ । धा꣣वत । म꣡द्या꣢꣯य । सो꣡म꣢꣯म् । वी꣣रा꣡य꣢ । शू꣡रा꣢꣯य ॥१२३॥

Mantra without Swara
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय । सोमं वीराय शूराय ॥

पन्यम्पन्यम् । पन्यम् । पन्यम् । इत् । सोतारः । आ । धावत । मद्याय । सोमम् । वीराय । शूराय ॥१२३॥

Samveda - Mantra Number : 123
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोतारः) सोम के सम्पादको ! तुम (मद्याय) हर्षयोग्य (शूराय) विक्रमशील (वीराय) शौर्यवान् [इन्द्र वा राजा] के लिये (पन्यं, पन्यं, सोमम्, इत्) उत्तम, उत्तम, सोम, ही (आधावत) प्राप्त कराओ।
सोम एक राजा ओषधि है जिसके भले प्रकार सम्पादन करके होम करने से दृष्टिहेतु और राजादि क्षत्रियवर्ग को प्राप्त कराने से रक्षा भी भले प्रकार प्राप्त करनी चाहिये। निरुक्त ११। २ में लिखा है कि :सोम एक ओषधि का नाम है जो सुनोति धातु से बना है क्योंकि उसे निचोड़ते हैं। इसका निघण्टुसम्बन्धी व्याख्यान बहुत प्रकार का और आश्चर्य-सा है।” इससे जाना जाता है कि सोम इस समय में ही आश्चर्य की बात नहीं प्रतीत होता किन्तु निरुक्तकार के समय में भी॥
Footnote
ऋ०८। २।२५॥६॥