Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1220

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रो꣢थ꣣द꣢श्वो꣣ न꣡ यव꣢꣯सेऽवि꣣ष्य꣢न्य꣣दा꣢ म꣣हः꣢ सं꣣व꣡र꣢णा꣣द्व्य꣡स्था꣢त् । आ꣡द꣢स्य꣣ वा꣢तो꣣ अ꣡नु꣢ वाति शो꣣चि꣡रध꣢꣯ स्म ते꣣ व्र꣡ज꣢नं कृ꣣ष्ण꣡म꣢स्ति ॥१२२०॥

प्रो꣡थ꣢꣯त् । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । य꣡वसे꣢꣯ । अ꣣विष्य꣢न् । य꣣दा꣢ । म꣣हः꣢ । सं꣣व꣡र꣢णात् । स꣣म् । व꣡र꣢꣯णात् । व्य꣡स्था꣢꣯त् । वि꣣ । अ꣡स्था꣢꣯त् । आत् । अ꣣स्य । वा꣡तः꣢꣯ । अ꣡नु꣢꣯ । वा꣣ति । शोचिः꣢ । अ꣡ध꣢꣯ । स्म꣣ । ते । व्र꣡ज꣢꣯नम् । कृ꣣ष्ण꣢म् । अ꣣स्ति ॥१२२०॥

Mantra without Swara
प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात् । आदस्य वातो अनु वाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति ॥

प्रोथत् । अश्वः । न । यवसे । अविष्यन् । यदा । महः । संवरणात् । सम् । वरणात् । व्यस्थात् । वि । अस्थात् । आत् । अस्य । वातः । अनु । वाति । शोचिः । अध । स्म । ते । व्रजनम् । कृष्णम् । अस्ति ॥१२२०॥

Samveda - Mantra Number : 1220
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र में अग्नि को सब देवों का दूत कहा था, उसमें यह बताने को कि एकदेश यज्ञवेदि में ही स्थित अग्नि, दूर देशस्थ देवों को भी हव्य भाग पहुँचा सकता है, यह मन्त्र कहता है कि (यदा) जब (यवसे) घास को (अविष्यन्) खाने को तैयार (प्रोथत्) हींसते हुए (अश्वः) घोड़े के (न) समान, (महः) भारी (संवरणात्) रुकावट [काष्ठ के ढेर] से (व्यऽस्थात्) निकलता हुआ स्थित होता है (आत् स्म) तब ही (अस्य) इस अग्नि की (शोचिः) लपट के (अनु) साथ (वातः) वायु (वाति) चल पड़ता है (अ) और (ते) उस अग्नि का (व्रजनम्) मार्ग (कृष्णम्) काला (अस्ति) है।
भाव यह है कि अग्नि की लपट के साथ वायु चल पड़ने से अग्नि को वायु की सहायता प्राप्त हो जाती है जिससे वह दूरस्थ देवभाग भी पहुँचा सकता है॥
Footnote
ऋ० ७। ३। २ में भी॥