Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 122

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्रा꣣हं꣢꣫ यथा꣣ त्व꣡मीशी꣢꣯य꣣ व꣢स्व꣣ ए꣢क꣣ इ꣢त् । स्तो꣣ता꣢ मे꣣ गो꣡स꣢खा स्यात् ॥१२२॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । अह꣢म् । य꣡था꣢꣯ । त्वम् । ई꣡शी꣢꣯य । व꣡स्वः꣢꣯ । ए꣡कः꣢ । इत् । स्तो꣣ता꣢ । मे꣣ । गो꣡सखा꣢꣯ । गो । स꣣खा । स्यात् ॥१२२॥

Mantra without Swara
यदिन्द्राहं यथा त्वमीशीय वस्व एक इत् । स्तोता मे गोसखा स्यात् ॥

यत् । इन्द्र । अहम् । यथा । त्वम् । ईशीय । वस्वः । एकः । इत् । स्तोता । मे । गोसखा । गो । सखा । स्यात् ॥१२२॥

Samveda - Mantra Number : 122
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) राजन् ! वा वृष्टिकर्तः ! (यथा) [पूर्वमन्त्रोक्त यज्ञ से] जैसे (त्वम्) तू (एक, इत्) अकेला, ही [बढ़ता है] ऐसे (यत्) जब कि (अहम्) मैं (वस्वः) गवादि का धन का (ईशीय) स्वामी हो जाऊँ [तेरी अनुकूलता से] तब (मे) मेरा (स्तोता) यज्ञानुष्ठान का ऋत्विज् विशेष (गोसखा) गवादि धनों वा पृथिवी का मित्र (स्यात्) हो।
इन दोनों मन्त्रों का तात्पर्य यह है कि यज्ञ से इन्द्र नामक विद्युद्विशेष का ऐश्वर्य आकाश में बढ़ता है और उससे पृथिवी का ऐश्वर्य बढ़ता है और यज्ञकर्त्ता लोग उससे गवादि धन और पृथिवी के मित्र बनते हैं तथा राजा की वृद्धि करने वाले भी गवादि तथा पृथिवी के मित्र होते हैं॥
Footnote
ऋ० ७।३।१०९ के वार्तिकादि का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८।१४।१८॥