Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1206

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣣सवे꣢ त꣣ उ꣡दी꣢रते ति꣣स्रो꣡ वाचो꣢꣯ मख꣣स्यु꣡वः꣢ । य꣢꣫दव्य꣣ ए꣢षि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१२०६॥

प्र꣣सवे । प्र꣣ । सवे꣢ । ते꣣ । उ꣣त् । ई꣢रते । तिस्रः꣢ । वा꣡चः꣢꣯ । म꣣खस्यु꣡वः꣢ । यत् । अ꣡व्ये꣢꣯ । ए꣡षि꣢꣯ । सा꣡न꣢꣯वि ॥१२०६॥

Mantra without Swara
प्रसवे त उदीरते तिस्रो वाचो मखस्युवः । यदव्य एषि सानवि ॥

प्रसवे । प्र । सवे । ते । उत् । ईरते । तिस्रः । वाचः । मखस्युवः । यत् । अव्ये । एषि । सानवि ॥१२०६॥

Samveda - Mantra Number : 1206
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
सोम ! (यद्) जब कि (सानवि) पर्वतशिखर की आकृति वाले उच्च (अव्ये) ऊनी दशापवित्र पर (एषि) तू जाता है तब (मखस्युवः) यज्ञार्थी यजमानादि की (ते) तेरे (प्रसवे) अभिषवविषयक (तित्रोवाचः) ३ ऋग्यजुः साम वेदों की वाणियें (उदीरते) उच्चारित होती हैं।
अर्थात् जब सोम अभिषुत होकर दशापवित्र में रक्खा जावे तब यजमानादि याज्ञिकों को सोमाभिषवविषयक वेदमन्त्रों का उच्चारण करना होता है।
Footnote
ऋ० ९। ५०। २ में भी॥