Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 120

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवजामय इन्द्रमातर ऋषिकाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ ब꣢ला꣣द꣢धि꣣ स꣡ह꣢सो जा꣣त꣡ ओज꣢꣯सः । त्वꣳ सन्वृ꣢꣯ष꣣न्वृ꣡षेद꣢꣯सि ॥१२०॥

त्व꣢म् । इ꣣न्द्र । ब꣡ला꣢꣯त् । अ꣡धि꣢꣯ । स꣡ह꣢꣯सः । जा꣣तः꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सः । त्व꣢म् । सन् । वृ꣣षन् । वृ꣡षा꣢꣯ । इत् । अ꣣सि ॥१२०॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः । त्वꣳ सन्वृषन्वृषेदसि ॥

त्वम् । इन्द्र । बलात् । अधि । सहसः । जातः । ओजसः । त्वम् । सन् । वृषन् । वृषा । इत् । असि ॥१२०॥

Samveda - Mantra Number : 120
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) ! हे इन्द्र (त्वम्) तू (बलात्) बल से (सहसः) दबाव से (ओजसः) धैर्य से (अधि) अधिक (जातः) प्रसिद्ध (सन्) होता हुआ (वृषन्) सेचन करने वाले ! (त्वम्) तू (वृषा, इत्, असि) सेचन करने वाला, ही है। अर्थात् तेरे समान अन्य सींचने वाला नहीं॥
बल ओजः और सहः ये बल ही के तीन भेद हैं। राजा वा इन्द्र देव विशेष वा परमेश्वर का बल सहः और ओजः सबसे अधिक हैं और वह जल वा कामनाओं का सींचने वाला सर्वोत्तम है॥
Footnote
ऋ० १०।१५३।२ में “सन्” इतना नहीं है, शेष समान है॥