Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 12

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
दू꣣तं꣡ वो꣢ वि꣣श्व꣡वे꣢दसꣳ हव्य꣣वा꣢ह꣣म꣡म꣢र्त्यम् । य꣡जि꣢ष्ठमृञ्जसे गि꣣रा꣢ ॥१२॥

दू꣣त꣢म् । वः꣣ । विश्व꣡वे꣢दसम् । वि꣣श्व꣢ । वे꣣दसम् । हव्यवा꣡ह꣢म् । ह꣣व्य । वा꣡ह꣢꣯म् । अ꣡म꣢꣯र्त्यम् । अ । म꣣र्त्यम् । य꣡जि꣢꣯ष्ठम् । ऋ꣣ञ्जसे । गिरा꣢ ॥१२॥

Mantra without Swara
दूतं वो विश्ववेदसꣳ हव्यवाहममर्त्यम् । यजिष्ठमृञ्जसे गिरा ॥

दूतम् । वः । विश्ववेदसम् । विश्व । वेदसम् । हव्यवाहम् । हव्य । वाहम् । अमर्त्यम् । अ । मर्त्यम् । यजिष्ठम् । ऋञ्जसे । गिरा ॥१२॥

Samveda - Mantra Number : 12
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे “अग्ने” यह पूर्व मन्त्र से अनुवृत्ति करी जाती है। हे ज्ञान स्वरूप ! परमात्मा ! (विश्ववेदसम्) सर्वज्ञ (अमर्त्यम्) अबिनाशी (हव्यवाहम्) कर्मफल के पहुँचाने वाले। इसीलिये (दूतम्) दूत के समान (वः) आप को (गिरा) वाणी से (ऋञ्जसे) स्तुत करता हूँ — प्रसन्न करता हूँ॥
भोगने योग्य कर्मफल हव्य है, उसको परमात्मा यथायोग्य दूत के समान विभागपूर्वक पहुँचाता है इस लिये उसको हव्यवाह कहा है॥
भौतिक पक्ष में—(विश्ववेदसम्) सब प्रकार के धनों वाले (अमर्त्यम्) अमनुष्य अर्थात् देव (यजिष्ठम्) अतिशय से यजन के योग्य (हव्यवाहम्) होम किये पदार्थों के पहुँचाने वाले (दूतम्) दूत [अग्नि] को (ऋञ्जसे) अनुकूल–प्रसन्न करता हूँ वा करूँ।
अग्नि को सब धनों वाला इस कारण कहा है कि सुवर्णादि समस्त धन आग्नेय हैं। इसीसे सुवर्ण रत्न मणि माणिक्यादि सब रत्न चमकीले और देखने में रमणीय हैं। अमर्त्य इसलिये कहा है कि मनुष्यादि प्राणियों के समान अग्नि नहीं है किन्तु दिव्य प्रभाव और शक्ति रखने से देव है। (वः) त्वाम् के स्थान में और (ऋञ्जसे) ऋञ्जामि वा ऋञ्जानि के स्थान में व्यत्यय से हुआ है।
Footnote
ऋग्वेद (४। ८। १) में भी ऐसा ही पाठ है॥