Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1197

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ विप्रा꣢꣯ अनूषत꣣ गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ । इ꣢न्द्र꣣ꣳ सो꣡म꣢स्य पी꣣त꣡ये꣢ ॥११९७॥

अ꣣भि꣢ । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । अनूषत । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । सो꣡म꣢꣯स्य । पी꣣त꣡ये꣢ ॥११९७॥

Mantra without Swara
अभि विप्रा अनूषत गावो वत्सं न धेनवः । इन्द्रꣳ सोमस्य पीतये ॥

अभि । विप्राः । वि । प्राः । अनूषत । गावः । वत्सम् । न । धेनवः । इन्द्रम् । सोमस्य । पीतये ॥११९७॥

Samveda - Mantra Number : 1197
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विप्राः) मेधावी ऋत्विज् लोग (सोमस्य) सोम के (पीतये) पानार्थ (इन्द्रम्) इन्द्र को (अभि अनूषत) आभिमुख्य से स्तुत करते अर्थात् सोम अभिषुत होने पर इन्द्र की स्तुति वाले मन्त्रों को पढ़ते हैं। दृष्टान्त — (न) जैसे (धेनवः) दुधार (गावः) गौवें (वत्सम्) बछड़े को प्रीति से रम्भा कर पुकारती हैं॥
Footnote
ऋ० ९। १२। २ में भी॥