Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 119

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ वाजयामसि म꣣हे꣢ वृ꣣त्रा꣢य꣣ ह꣡न्त꣢वे । स꣡ वृषा꣢꣯ वृष꣣भो꣡ भु꣢वत् ॥११९॥

त꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वा꣣जयामसि । महे꣢ । वृ꣣त्रा꣡य꣢ । ह꣡न्त꣢꣯वे । सः । वृ꣡षा꣢꣯ । वृ꣣षभः꣢ । भु꣣वत् ॥११९॥

Mantra without Swara
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे । स वृषा वृषभो भुवत् ॥

तम् । इन्द्रम् । वाजयामसि । महे । वृत्राय । हन्तवे । सः । वृषा । वृषभः । भुवत् ॥११९॥

Samveda - Mantra Number : 119
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(महे) बड़े (वृत्राय, हन्तवे) मेघ को, गिराने के लिए, हम (तम्, इन्द्रम्) उस, इन्द्र को (वाजयामसि) बलिष्ठ करें, जिससे (सः, वृषा) वह, वर्षाने वाला (वृषभः भुवत्) वर्षांने लगे।
मनुष्यों को वर्षा के निमित्त इन्द्रयाग करना चाहिए। इन्द्र नामक विद्युद्विशेष को यज्ञभाग द्वारा बलिप्ठ करने से वह मेघ को वर्षाता है। वा राजा को बलिष्ठ करने से वह वृत्र दुष्ट असुरों को हनन करे॥
Footnote
अष्टाध्यायी (गणसूत्र ३।१।२५) ६।४।१५५॥ ५।३।६५॥ ७।१।३९॥ ७।१। ४६॥ ३।४।९॥ निघण्टु २। ९ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। ३।७।५॥