Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1177

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रतर्दनो दैवोदासिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च꣣मूष꣢च्छ्ये꣣नः꣡ श꣢कु꣣नो꣢ वि꣣भृ꣡त्वा꣢ गोवि꣣न्दु꣢र्द्र꣣प्स꣡ आयु꣢꣯धानि बि꣡भ्र꣢त् । अ꣣पा꣢मू꣣र्मि꣡ꣳ सच꣢꣯मानः समु꣣द्रं꣢ तु꣣री꣢यं꣣ धा꣡म꣢ महि꣣षो꣡ वि꣢वक्ति ॥११७७॥

च꣣मूष꣢त् । च꣣मू । स꣢त् । श्ये꣣नः꣢ । श꣣कुनः꣢ । वि꣣भृ꣡त्वा꣢ । वि꣣ । भृ꣡त्वा꣢꣯ । गो꣣विन्दुः꣢ । गो । विन्दुः꣢ । द्र꣣प्सः꣢ । आ꣡यु꣢꣯धानि । बि꣡भ्र꣢꣯त् । अ꣣पा꣢म् । ऊ꣣र्मि꣢म् । स꣡च꣢꣯मानः । स꣣मु꣢द्रम् । स꣣म् । उद्र꣢म् । तु꣣री꣡य꣢म् । धा꣡म꣢꣯ । म꣣हिषः꣢ । वि꣣वक्ति ॥११७७॥

Mantra without Swara
चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत् । अपामूर्मिꣳ सचमानः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति ॥

चमूषत् । चमू । सत् । श्येनः । शकुनः । विभृत्वा । वि । भृत्वा । गोविन्दुः । गो । विन्दुः । द्रप्सः । आयुधानि । बिभ्रत् । अपाम् । ऊर्मिम् । सचमानः । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । तुरीयम् । धाम । महिषः । विवक्ति ॥११७७॥

Samveda - Mantra Number : 1177
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(चमूषत्) द्युलोक और पृथिवी लोक के मध्य में स्थित (श्येन) शिखरा [बाज] (शकुनः) पक्षी सा बलवान् (विभृत्वा) आकाश बिहारी (गोविन्दुः) सूर्य किरणों में गया (द्रप्सः) जल में मिला (आयुधानि, बिभ्रत्) बिजुली रूपी शस्त्रों को, धारण करता हुआ (अपाम्, ऊर्मिं, समुद्र, सचमानः) जलों की, लहरीयुक्त, अन्तरिक्ष को, सेवन करता हुआ, (महिषः) महान् सोम (तुरीयंधाम) द्युलोक पृथिवी लोक और अन्तरिक्ष लोक इन तीनों में चतुर्थ से अद्भुत स्थान को (विवक्ति) सेवित करता है॥
Footnote
ऋ० ९। ९६।१९ में भी। सायणाचार्य ने “द्रप्सः” और “आयुधानि” पदों की व्याख्या नहीं की दीखती, या जो दो पुस्तक हमने देखे वे खण्डित हों। इसी से उस भाष्य की संगति भी नहीं बैठती। और आश्चर्य है कि ज्वालाप्रसाद ने उन दोनों पदों के बिना ही अन्वय पूरा कर दिया॥