Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1165

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ते꣡ नो꣢ वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣व꣢꣫स्परि꣣ प꣡व꣢न्ता꣣मा꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म् । स्वा꣣ना꣢ दे꣣वा꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥११६५॥

ते । नः꣣ । वृष्टि꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । प꣡व꣢꣯न्ताम् । आ । सु꣣वी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । स्वा꣣नाः꣢ । दे꣣वा꣡सः꣢ । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥११६५॥

Mantra without Swara
ते नो वृष्टिं दिवस्परि पवन्तामा सुवीर्यम् । स्वाना देवास इन्दवः ॥

ते । नः । वृष्टिम् । दिवः । परि । पवन्ताम् । आ । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । स्वानाः । देवासः । इन्दवः ॥११६५॥

Samveda - Mantra Number : 1165
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
समस्त सूक्त का एकत्र ही अन्वय है कि — (ये) जो (सोमासः) सोम (परावति) दूर देश में (ये) और जो (अर्वावति) समीप देश में (ये वा) और जो (अवः) इस (शर्यणावति) भूमि में (ये) और जो (अर्जीकेषु) ऋजु = सरल =सम (कृत्वसु) किये हुए स्थानों में (ये) और जो (पस्त्यानां मध्ये) गृहों के मध्य में (ये वा) और जो (पञ्चसु जनेषु) ४ ऋत्विज् और ५ वां यजमान इन पांचों में (सुन्विरे) अभिषुत किये जाते हैं (ते) वे (स्वानाः) अभिषूयमाण (देवासः) दिव्य (इन्दवः) सोम (नः) हमारे लिये (दिवः परि) आकाश के सकाश से (सुवीर्यम्) जिससे सुन्दर वीर्य होवे (वृष्टिम्) वर्षा को (आ—पवन्ताम्) सर्वत: वर्षावें॥
Footnote
निघण्टु ३। २६॥ २। १६॥ ३। ४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद ९। ६५। २२ — २३ — २४ में भी॥