Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1164

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡ आ꣢र्जी꣣के꣢षु꣣ कृ꣡त्व꣢सु꣣ ये꣡ मध्ये꣢꣯ प꣣꣬स्त्या꣢꣯नाम् । ये꣢ वा꣣ ज꣡ने꣢षु प꣣ञ्च꣡सु꣢ ॥११६४॥

ये । आ꣣जीर्के꣡षु꣢ । कृ꣡त्व꣢꣯सु । ये । म꣡ध्ये꣢꣯ । प꣣꣬स्त्या꣢नाम् । ये । वा꣣ । ज꣡ने꣢꣯षु । प꣣ञ्च꣡सु꣢ ॥११६४॥

Mantra without Swara
य आर्जीकेषु कृत्वसु ये मध्ये पस्त्यानाम् । ये वा जनेषु पञ्चसु ॥

ये । आजीर्केषु । कृत्वसु । ये । मध्ये । पस्त्यानाम् । ये । वा । जनेषु । पञ्चसु ॥११६४॥

Samveda - Mantra Number : 1164
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
समस्त सूक्त का एकत्र ही अन्वय है कि — (ये) जो (सोमासः) सोम (परावति) दूर देश में (ये) और जो (अर्वावति) समीप देश में (ये वा) और जो (अवः) इस (शर्यणावति) भूमि में (ये) और जो (अर्जीकेषु) ऋजु = सरल =सम (कृत्वसु) किये हुए स्थानों में (ये) और जो (पस्त्यानां मध्ये) गृहों के मध्य में (ये वा) और जो (पञ्चसु जनेषु) ४ ऋत्विज् और ५ वां यजमान इन पांचों में (सुन्विरे) अभिषुत किये जाते हैं (ते) वे (स्वानाः) अभिषूयमाण (देवासः) दिव्य (इन्दवः) सोम (नः) हमारे लिये (दिवः परि) आकाश के सकाश से (सुवीर्यम्) जिससे सुन्दर वीर्य होवे (वृष्टिम्) वर्षा को (आ—पवन्ताम्) सर्वत: वर्षावें॥
Footnote
निघण्टु ३। २६॥ २। १६॥ ३। ४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद ९। ६५। २२ — २३ — २४ में भी॥