Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1158

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ काण्वौ शिखण्डिन्यावप्सरसौ काश्यपौ वा Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स꣡मी꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न मा꣣तृ꣡भिः꣢ सृ꣢ज꣡ता꣢ गय꣣सा꣡ध꣢नम् । दे꣣वाव्यां꣣꣬३꣱म꣡द꣢म꣣भि꣡ द्विश꣢꣯वसम् ॥११५८॥

सम् । ई꣣ । वत्स꣢म् । न । मा꣣तृ꣡भिः꣢ । सृ꣣ज꣢त꣢ । ग꣣यसा꣡ध꣢नम् । ग꣣य । सा꣡ध꣢꣯नम् । देवाव्य꣣꣬म् । दे꣣व । अव्य꣣꣬म् । म꣡द꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । द्वि꣡श꣢꣯वसम् ॥११५८॥

Mantra without Swara
समी वत्सं न मातृभिः सृजता गयसाधनम् । देवाव्यां३मदमभि द्विशवसम् ॥

सम् । ई । वत्सम् । न । मातृभिः । सृजत । गयसाधनम् । गय । साधनम् । देवाव्यम् । देव । अव्यम् । मदम् । अभि । द्विशवसम् ॥११५८॥

Samveda - Mantra Number : 1158
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे ऋत्विजो ! तुम (गयसाधनम्) प्राण, गृह, धन वा सन्तान के साधन, (देवाव्यम्) देवों के रक्षक (मदम्) हृष्टि-पुष्टि कारक (द्विशवसम्) दोनों लोकों के बल (ई) इस सोम को (मातृभिः) माता के समान वसतीवरी नामक जलों से (अभि-सं-सृजत) सर्वतः मिलाओ (न) जैसे (वत्सम्) बछड़े को माताओं—गौवों से मिलाते हैं, तद्वत् ऋ० ९। १०४। २ में भी॥
Footnote
यद्यपि बंगाल एसियाटिक सुसाइटी के सायण भाष्ययुक्त पुस्तक में “अभि ‘प्रि’ द्विशवसम्” यह “प्रि” इतना अधिक पाठ छप रहा है और अनुमानतः उसी की देखा देखी विचारे ज्वालाप्रसाद ने भी लिख दिया और व्याख्या भी कर मारी है, तथा वैदिकयन्त्रालय अजमेर ने भी वैसा ही छाप दिया है, तथापि हम इस पाठ का आदर नहीं करते, क्योंकि उसी सायणभाष्य में इस “प्रि” युक्त पाठ की व्याख्या नहीं है, न गान के पुस्तक में है, न ऋक्संहिता में, न जीवानन्द के पुस्तक में, और न पं० गुरुदत्त एम०ए० के संस्कार युक्त लाहौर के पुस्तक में यह पाठ है। हमारी समझ में तो यह पाठ लेखकों की भ्रान्ति से ही बन गया है॥