Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 115

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣡द्वो꣢ गाय सु꣣ते꣡ सचा꣢꣯ पुरुहू꣣ता꣢य꣣ स꣡त्व꣢ने । शं꣢꣫ यद्गवे꣣ न꣢ शा꣣कि꣡ने꣢ ॥११५॥

त꣢त् । वः꣣ । गाय । सुते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । पु꣣रुहूता꣡य꣣ । पु꣣रु । हूता꣡य꣢ । स꣡त्व꣢꣯ने । शम् । यत् । ग꣡वे꣢꣯ । न꣢ । शा꣣कि꣡ने꣢ ॥११५॥

Mantra without Swara
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्गवे न शाकिने ॥

तत् । वः । गाय । सुते । सचा । पुरुहूताय । पुरु । हूताय । सत्वने । शम् । यत् । गवे । न । शाकिने ॥११५॥

Samveda - Mantra Number : 115
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे स्तोता ! तू (यत्) जो (गवे) पृथ्वी के (न) समान (वः) तुझ (सुते) स्तोता के लिये (शम्) सुखदायक हो (तत्) उसको (सत्वने) शत्रुगण को बिछा देने वाले (शाकिने) शक्तिमान् (पुरुहूताय) इन्द्र के लिये (सचा) साथ मिल कर (गाय) गा॥
मनुष्यों को योग्य है कि शत्रुबिनाशक इन्द्र अर्थात् परमेश्वर वा राजा, अथवा मेघविदारक इन्द्र अथवा अन्धकारनाशक सूर्य के लिये उसके गुणों का बखान मिल जुल कर करें। इन्द्र को “पुरुहूत” इसलिये कहते हैं कि वेदों के मध्य “बहुतायत से वर्णित” है, जैसा कि केवल ऋग्वेद मात्र में ही इन्द्र का सबसे अधिक वर्णन है। ऋग्वेद के मन्त्रों के आदि में अन्य सब देवतों की अपेक्षा “अग्नि” पद अधिक अर्थात् २०८ बार आया है परन्तु इन्द्र पद उससे भी अधिक २५५ बार आया है। क्योंकि इन्द्र परमैश्वर्यवान् है उसकी ईश्वरता का वर्णन अधिक आवश्यक भी है। और यह पद परमेश्वर की परमेश्वरता का वाचक भी है इसलिये वेदों में परमेश्वर का ज्ञान वर्णन आदि सबसे अधिक है। यह भी कारण है कि वेदों के द्वारा ईश्वर का ज्ञान अधिक सम्भव है॥
Footnote
अष्टाध्यायी १।२।५८॥ निघं० ३।१६॥१।१॥ निरुक्त ५।५ आदि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ६।४५।२२॥१॥