Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1148

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा या꣢꣯हि꣣ तू꣡तु꣢जान꣣ उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि हरिवः । सु꣣ते꣡ द꣢धिष्व न꣣श्च꣡नः꣢ ॥११४८॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । आ । या꣣हि । तू꣡तु꣢꣯जानः । उ꣡प꣢꣯ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । ह꣣रिवः । सुते꣢ । द꣣धिष्व । नः । च꣡नः꣢꣯ ॥११४८॥

Mantra without Swara
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥

इन्द्र । आ । याहि । तूतुजानः । उप । ब्रह्माणि । हरिवः । सुते । दधिष्व । नः । चनः ॥११४८॥

Samveda - Mantra Number : 1148
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हरि शब्द इन्द्र के अश्वों का वाचक है जैसा कि निघं० १।१५। १—२ ऊपर लिखा है। तदनुसार (हरिवः) अश्व = किरणों वाले ! इन्द्र ! वायो ! (ब्रह्माणि) मन्त्रों को उच्चारते हुए हमें (तूतुजानः) शीघ्रता करता हुआ (उपा—याहि) समीप प्राप्त हो और (नः) हमारे लिये (सुते) सोम अभिषुत करने पर (चनः) अन्न को (दधिष्व) धारित कर॥
भावार्थ पूर्ववत् लगा लेना॥
Footnote
ऋ० १। ३। ६ में मी॥