Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1147

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा या꣢꣯हि धि꣣ये꣢षि꣣तो꣡ विप्र꣢꣯जूतः सु꣣ता꣡व꣢तः । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि वा꣣घ꣡तः꣢ ॥११४७॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । आ । या꣣हि । धिया꣢ । इ꣣षितः꣢ । वि꣡प्र꣢꣯जूतः । वि꣡प्र꣢꣯ । जू꣣तः । सु꣡ता꣢वतः । उ꣡प꣢꣯ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । वा꣣घ꣡तः꣢ ॥११४७॥

Mantra without Swara
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥

इन्द्र । आ । याहि । धिया । इषितः । विप्रजूतः । विप्र । जूतः । सुतावतः । उप । ब्रह्माणि । वाघतः ॥११४७॥

Samveda - Mantra Number : 1147
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) वायो ! (विप्रजूतः) मेधावी लोगों — ऋत्विजों से प्रेरित (धिया) कर्म = यजन से (इषितः) प्राप्त हुआ (सुतावतः) अभिषुत सोमयुक्त (बाधतः) ऋत्विजों को [निघण्टु ३। १८। ३] जो (ब्रह्माणि) वेदमन्त्रों को उच्चार रहे हैं उनके (उप—याहि) समीप प्राप्त हो।
Footnote
ऋ० १। ३। ५ में भी॥