Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1144

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣣म्रा꣢जा꣣ या꣢ घृ꣣त꣡यो꣢नी मि꣣त्र꣢श्चो꣣भा꣡ वरु꣢꣯णश्च । दे꣣वा꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ प्रश꣣स्ता꣢ ॥११४४॥

स꣣म्रा꣡जा꣢ । स꣣म् । रा꣡जा꣢꣯ । या । घृ꣣त꣡यो꣢नी । घृ꣣त꣢ । यो꣣नी꣢इति । मि꣣त्रः꣢ । मि꣢ । त्रः꣣ । च । उभा꣢ । व꣡रु꣢꣯णः । च꣣ । देवा꣢ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प्र꣣शस्ता꣢ । प्र꣣ । शस्ता꣢ ॥११४४॥

Mantra without Swara
सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च । देवा देवेषु प्रशस्ता ॥

सम्राजा । सम् । राजा । या । घृतयोनी । घृत । योनीइति । मित्रः । मि । त्रः । च । उभा । वरुणः । च । देवा । देवेषु । प्रशस्ता । प्र । शस्ता ॥११४४॥

Samveda - Mantra Number : 1144
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
वे मित्र वरुण कैसे हैं ? सो कहते हैं कि (या) जो (मित्रश्च वरुणश्च) मित्र और वरुण (उभा) दोनों (देवा) देव (देवेषु) अन्य देवों में (प्रशस्ता) श्रेष्ठ (घृतयोनी) जल के उत्पन्न करने वाले और (सम्राजा) भले प्रकार प्रकाशमान हैं उन को प्रशंसित करो यह पूर्व मन्त्र से अन्वय है।
Footnote
ऋ० ५। ६८। २ में भी॥