Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 114

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
य꣡द्वा उ꣢꣯ वि꣣श्प꣡तिः꣢ शि꣣तः꣡ सुप्री꣢꣯तो꣣ म꣡नु꣢षो वि꣣शे꣢ । वि꣢꣫श्वेद꣣ग्निः꣢꣫ प्रति꣣ र꣡क्षा꣢ꣳसि सेधति ॥११४॥

य꣢द् । वै । उ꣣ । विश्प꣡तिः꣢ । शि꣣तः꣢ । सु꣡प्री꣢꣯तः । सु । प्री꣣तः म꣡नु꣢꣯षः । वि꣣शे꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । अ꣣ग्निः꣢ । प्र꣡ति꣢꣯ । रक्षाँ꣢꣯सि । से꣣धति ॥११४॥

Mantra without Swara
यद्वा उ विश्पतिः शितः सुप्रीतो मनुषो विशे । विश्वेदग्निः प्रति रक्षाꣳसि सेधति ॥

यद् । वै । उ । विश्पतिः । शितः । सुप्रीतः । सु । प्रीतः मनुषः । विशे । विश्वा । इत् । अग्निः । प्रति । रक्षाँसि । सेधति ॥११४॥

Samveda - Mantra Number : 114
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यद्, वै, उ) जब कि (विश्पतिः) प्रजा का पालक (शितः) तीव्र सूक्ष्म (अग्निः) परमेश्वर वा भौतिक (मनुषः) मनुष्य के (विशे) घर में (सुप्रीतः) भक्ति वा हवन से अनुकूलता को प्राप्त होता है (इत्) तभी (विश्वा) सब (रक्षांसि) विघ्नकारक दुष्ट रोग दस्यु आदि राक्षसों को (प्रति, सेधति) निवृत्त करता है।
परमात्मा की प्रसन्नता और अग्नि में भले प्रकार होमकरणादि से ही मनुष्य के घर की पवित्रता होती है और समस्त दुष्ट रोग दस्यु आदि राक्षसों का निबारण होता है। पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव ने मूल में शुद्ध “सेवति” पाठ होते हुए भी सायणभाष्य के अशुद्ध मुद्रित “सिसेधति” को देखकर यह वैसा ही व्याख्यान कर दिया। तथा “प्रकट होता है” यह निर्मूल अर्थ किया है।
Footnote
ऋ० ८। २३। १३ में “विशि” इतना अन्तर है॥