Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1138

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ म꣣न्द्र꣡मा वरे꣢꣯ण्य꣣मा꣢꣫ विप्र꣣मा꣡ म꣢नी꣣षि꣡ण꣢म् । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३८॥

आ । म꣣न्द्र꣢म् । आ । व꣡रे꣢꣯ण्यम् । आ । वि꣡प्र꣢꣯म् । वि । प्र꣣म् । आ꣢ । म꣣नीषि꣡ण꣢म् । पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । पु꣣रुस्पृ꣡ह꣢म् । पु꣣रु । स्पृ꣡ह꣢꣯म् ॥११३८॥

Mantra without Swara
आ मन्द्रमा वरेण्यमा विप्रमा मनीषिणम् । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥

आ । मन्द्रम् । आ । वरेण्यम् । आ । विप्रम् । वि । प्रम् । आ । मनीषिणम् । पान्तम् । आ । पुरुस्पृहम् । पुरु । स्पृहम् ॥११३८॥

Samveda - Mantra Number : 1138
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मन्द्रम्) हृष्टिकारक सोम का (आ) [पूर्व मन्त्र से “वृणीमहे” क्रिया की अनुवृत्ति है] हम सर्वतः वरण करते हैं (वरेण्यम्) वरणीय वा भजनीय सोम का (आ) हम वरण करते हैं (विप्रम्) धारणावती बुद्धितत्त्व वाले सोम का (आ) हम वरण करते हैं (मनीषिणम्) साधारण बुद्धितत्वयुक्त सोम का (आ) हम वरण करते हैं (पान्तम्) रक्षा करते हुए तथा (पुरुस्पृहम्) बहुतों से चाहे हुए सोम का (आ) हम वरण करते हैं॥
Footnote
ऋ० ९। ६५। २९ में भी॥