Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1134

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ वा꣣यु꣡मिन्द्र꣢꣯म꣣श्वि꣡ना꣢ सा꣣कं꣡ मदे꣢꣯न गच्छति । र꣢णा꣣ यो꣡ अ꣢स्य꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥११३४॥

सः । वा꣣यु꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । सा꣣क꣢म् । म꣡दे꣢꣯न । ग꣣च्छति । र꣡ण꣢꣯ । यः । अ꣣स्य । ध꣡र्म꣢꣯णा ॥११३४॥

Mantra without Swara
स वायुमिन्द्रमश्विना साकं मदेन गच्छति । रणा यो अस्य धर्मणा ॥

सः । वायुम् । इन्द्रम् । अश्विना । साकम् । मदेन । गच्छति । रण । यः । अस्य । धर्मणा ॥११३४॥

Samveda - Mantra Number : 1134
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो यजमान (अस्य) इस सोम के (धर्मणा) अभिषवादि धर्म से (रण) रमण करता है (सः) वह (इन्द्रम्) इन्द्र नामक (वायुम) वायु को (अश्विना) और द्यावापृथिवी को (मदेन) हर्ष के साथ (गच्छति) प्राप्त होता है॥
Footnote
ऋ० ९। ७। ७ में धर्मणा के स्थान में धर्मभिः पाठ है और सायणाचार्य ने भ्रम से वही यहां भी व्याख्यात कर दिया है॥