Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1131

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ य꣡त्काव्या꣢꣯ क꣣वि꣢र्नृ꣣म्णा꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ अर्ष꣢꣯ति । स्व꣢꣯र्वा꣣जी꣡ सि꣢षासति ॥११३१॥

प꣡रि꣢꣯ । यत् । का꣡व्या꣢꣯ । क꣣विः꣢ । नृ꣣म्णा꣢ । पु꣣नानः꣢ । अ꣡र्ष꣢꣯ति । स्वः꣢ । वा꣣जी꣢ । सि꣣षासति ॥११३१॥

Mantra without Swara
परि यत्काव्या कविर्नृम्णा पुनानो अर्षति । स्वर्वाजी सिषासति ॥

परि । यत् । काव्या । कविः । नृम्णा । पुनानः । अर्षति । स्वः । वाजी । सिषासति ॥११३१॥

Samveda - Mantra Number : 1131
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(कविः) वाणी का सुधारने वाला सोम (नृम्णा) धनों वा बलों को (पुनानः) शोधता हुआ (काव्या) कवि के कर्म काव्य = वैदिक स्तोत्रों को (यत्) जब कि (परि—अर्षति) प्राप्त होता अर्थात् अपने को वेदमन्त्रों में उक्त प्रशंसाओं के तुल्य दर्शाता है तब (स्वः) सुख को (वाजी) बलवान् बलदायक सोम (सिषासति) मानो बांटना चाहता है॥
Footnote
ऋ० ९। ७। ४ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥