Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1130

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ यु꣣जा꣢ वा꣣चो꣡ अ꣢ग्रि꣣यो꣡ वृषो꣢꣯ अचिक्रद꣣द्व꣡ने꣢ । स꣢द्मा꣣भि꣢ स꣣त्यो꣡ अ꣢ध्व꣣रः꣢ ॥११३०॥

प्र । यु꣣जा꣢ । वा꣣चः꣢ । अ꣣ग्रियः꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । उ꣣ । अचिक्रदत् । व꣡ने꣢꣯ । स꣡द्म꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । स꣣त्यः꣢ । अ꣣ध्व꣢रः ॥११३०॥

Mantra without Swara
प्र युजा वाचो अग्रियो वृषो अचिक्रदद्वने । सद्माभि सत्यो अध्वरः ॥

प्र । युजा । वाचः । अग्रियः । वृषा । उ । अचिक्रदत् । वने । सद्म । अभि । सत्यः । अध्वरः ॥११३०॥

Samveda - Mantra Number : 1130
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्रियः) हवियों में मुख्य सोम (वाचः) वाणियों को (युजाः) युक्त ठीक (प्र) करता है अर्थात् (वृषा उ) वृष्टिकारक (सत्यः) स्थिर फल वाला (अध्वरः) यज्ञस्वरूप सोम (सद्म) यज्ञस्थान (अभि) में (वने) वसतीवरी नाम के जल में (अचिक्रदत्) शब्द करता है।
Footnote
सायणाचार्य ने जो पदपाद के अनुसार “वृषा, उ” इस प्रकार पदद्वय न करके “वृष” पद की व्याख्या की है सो पदकार के विरुद्ध है, यही श्री सत्यव्रतसामश्रमी जी का कथन है॥
ऋ० ९। ७। ३ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥