Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1126

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ना꣢भा꣣ ना꣡भिं꣢ न꣣ आ꣡ द꣢दे꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ सू꣡र्यं꣢ दृ꣣शे꣢ । क꣣वे꣡रप꣢꣯त्य꣣मा꣡ दु꣢हे ॥११२६॥

ना꣡भा꣢꣯ । ना꣡भि꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । द꣣दे । च꣡क्षु꣢꣯षा । सू꣡र्य꣢꣯म् । दृ꣡शे꣢ । क꣣वेः꣢ । अ꣡प꣢꣯त्यम् । आ । दु꣣हे ॥११२६॥

Mantra without Swara
नाभा नाभिं न आ ददे चक्षुषा सूर्यं दृशे । कवेरपत्यमा दुहे ॥

नाभा । नाभिम् । नः । आ । ददे । चक्षुषा । सूर्यम् । दृशे । कवेः । अपत्यम् । आ । दुहे ॥११२६॥

Samveda - Mantra Number : 1126
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(नाभिम्) यज्ञ की नाभिरूपी सोम को (नः) हम अपनी (नाभा) नाभि में (आददे) ग्रहण करते अर्थात् पीते हैं। किस लिये ? उत्तर—(चक्षुषा) आंख से (सूर्यम्) सूर्य को (दृशे) देखने के लिये। और (कवेः) क्रान्तदर्शी सोम को (अपत्यम्) सन्तानरूपी अंशु को (आदुहे) हम पूरते हैं।
Footnote
ऋ० ९। १०। ८ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥