Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1119

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ स्वा꣣ना꣢सो꣣ र꣡था꣢ इ꣣वा꣡र्व꣢न्तो꣣ न꣡ श्र꣢व꣣स्य꣡वः꣢ । सो꣡मा꣢सो रा꣣ये꣡ अ꣢क्रमुः ॥१११९॥

प्र । स्वा꣣ना꣡सः꣢ । र꣡थाः꣢꣯ । इ꣢व । अ꣡र्व꣢꣯न्तः । न । श्र꣣वस्य꣡वः꣢ । सो꣡मा꣢꣯सः । रा꣡ये꣢ । अ꣣क्रमुः ॥१११९॥

Mantra without Swara
प्र स्वानासो रथा इवार्वन्तो न श्रवस्यवः । सोमासो राये अक्रमुः ॥

प्र । स्वानासः । रथाः । इव । अर्वन्तः । न । श्रवस्यवः । सोमासः । राये । अक्रमुः ॥१११९॥

Samveda - Mantra Number : 1119
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स्वानासः) अभिषव के समय “उपरव” नामक गढ़ों में शब्द करते हुए (सोमासः) सोम (रथा इव) रथ से रमणीय और (अर्वन्तः) घोड़ों (न) से वेगवान् होते हुए (अवस्यवः) यजमान के अन्न को चाहते हुए (राये) यजमानार्थ धन के लिये (प्राऽक्रमुः) यत्न करते हैं।
यूप के गढ़े “उपरव” कहाते हैं। जैसा कि कात्यायन सूत्र ८। ४। २५ (संस्कृतभाष्य में देखिये) में कहा है—कि जैसे यूप का गढ़ा खोदा जाता है वैसे ही यहां भी उपरव नाम के गढ़े अभ्रिस्वीकार से लेकर परिलेखनपूर्वक बनावे। यह उस सूत्र का श्रीसत्यव्रतसामश्रमी जी कृत अर्थ है।
Footnote
ऋग्वेद ९। १०। १ में भी॥