Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1115

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र ॥१११५॥

उ꣡प꣢꣯ । प्र꣣क्षे꣢ । प्र꣣ । क्षे꣢ । म꣡धु꣢꣯मति । क्षि꣣य꣡न्तः꣢ । पु꣡ष्ये꣢꣯म । र꣣यि꣢म् । धी꣣म꣡हे꣢ । ते꣣ । इन्द्र ॥१११५॥

Mantra without Swara
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र ॥

उप । प्रक्षे । प्र । क्षे । मधुमति । क्षियन्तः । पुष्येम । रयिम् । धीमहे । ते । इन्द्र ॥१११५॥

Samveda - Mantra Number : 1115
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इस ३ ऋचा के सूक्त की व्याख्या पूर्व कर आये हैं। ऐसा विदित होता है कि इस तृच में ३ ऋचाओं के ३ प्रतीक ही हैं जिनमें से “प्रव” यह ४४६ पर और “अर्च” यह ४४५ पर तथा “उप” यह ४४४ पर व्याख्यात किया गया है। ये ऋचा वहां छन्द प्राचिक अध्याय ४ खण्ड १ में आ चुकी हैं। यहां उनको दुबारा पढ़ने का प्रयोजन “उद्वंशपुत्र” नामक गान की उत्पत्ति करना है। जैसा कि “ऊहगान” प्रपाठक ३ का अन्तिम गान है। जो गीतियुक्त बंगाल ऐशियाटिक सुसाइटी के छापे पुस्तक के १०० वें पृष्ठ पर छपा है और ऐसा ही श्री सत्यव्रत सामश्रमी जी लिखते हैं और विवरणकार को भी यही सम्मत है। परन्तु सायणाचार्य इससे विलक्षण यह लिखते हैं कि “यह एक ऋचा का “प्रवोर्चोप” सूक्त है, यह कोई ४ अक्षर की ऋचा सी है, जैसी कि ऋग्वेदियों की “भद्रं नो अपि वातय मनः यह एक ही पाद और ऋचा मानी है”॥
Footnote
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