Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1114

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अर्च꣢꣯न्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः ॥१११४॥

अ꣡र्च꣢꣯न्ति । अ꣣र्क꣢म् । म꣣रु꣡तः꣢ । स्व꣣र्काः꣢ । सु꣣ । अर्काः꣢ । आ । स्तो꣣भति । श्रुतः꣡ । यु꣡वा꣢꣯ । सः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥१११४॥

Mantra without Swara
अर्चन्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः ॥

अर्चन्ति । अर्कम् । मरुतः । स्वर्काः । सु । अर्काः । आ । स्तोभति । श्रुतः । युवा । सः । इन्द्रः ॥१११४॥

Samveda - Mantra Number : 1114
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इस ३ ऋचा के सूक्त की व्याख्या पूर्व कर आये हैं। ऐसा विदित होता है कि इस तृच में ३ ऋचाओं के ३ प्रतीक ही हैं जिनमें से “प्रव” यह ४४६ पर और “अर्च” यह ४४५ पर तथा “उप” यह ४४४ पर व्याख्यात किया गया है। ये ऋचा वहां छन्द प्राचिक अध्याय ४ खण्ड १ में आ चुकी हैं। यहां उनको दुबारा पढ़ने का प्रयोजन “उद्वंशपुत्र” नामक गान की उत्पत्ति करना है। जैसा कि “ऊहगान” प्रपाठक ३ का अन्तिम गान है। जो गीतियुक्त बंगाल ऐशियाटिक सुसाइटी के छापे पुस्तक के १०० वें पृष्ठ पर छपा है और ऐसा ही श्री सत्यव्रत सामश्रमी जी लिखते हैं और विवरणकार को भी यही सम्मत है। परन्तु सायणाचार्य इससे विलक्षण यह लिखते हैं कि “यह एक ऋचा का “प्रवोर्चोप” सूक्त है, यह कोई ४ अक्षर की ऋचा सी है, जैसी कि ऋग्वेदियों की “भद्रं नो अपि वातय मनः यह एक ही पाद और ऋचा मानी है”॥
Footnote
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