Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1113

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र꣡ व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते ॥१११३॥

प्र꣢ । वः꣣ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वृ꣣त्रह꣡न्त꣢माय । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯माय । वि꣡प्रा꣢꣯य । वि । प्रा꣣य । गाथ꣢म् । गा꣣यत । य꣢म् । जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥१११३॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते ॥

प्र । वः । इन्द्राय । वृत्रहन्तमाय । वृत्र । हन्तमाय । विप्राय । वि । प्राय । गाथम् । गायत । यम् । जुजोषते ॥१११३॥

Samveda - Mantra Number : 1113
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इस ३ ऋचा के सूक्त की व्याख्या पूर्व कर आये हैं। ऐसा विदित होता है कि इस तृच में ३ ऋचाओं के ३ प्रतीक ही हैं जिनमें से “प्रव” यह ४४६ पर और “अर्च” यह ४४५ पर तथा “उप” यह ४४४ पर व्याख्यात किया गया है। ये ऋचा वहां छन्द प्राचिक अध्याय ४ खण्ड १ में आ चुकी हैं। यहां उनको दुबारा पढ़ने का प्रयोजन “उद्वंशपुत्र” नामक गान की उत्पत्ति करना है। जैसा कि “ऊहगान” प्रपाठक ३ का अन्तिम गान है। जो गीतियुक्त बंगाल ऐशियाटिक सुसाइटी के छापे पुस्तक के १०० वें पृष्ठ पर छपा है और ऐसा ही श्री सत्यव्रत सामश्रमी जी लिखते हैं और विवरणकार को भी यही सम्मत है। परन्तु सायणाचार्य इससे विलक्षण यह लिखते हैं कि “यह एक ऋचा का “प्रवोर्चोप” सूक्त है, यह कोई ४ अक्षर की ऋचा सी है, जैसी कि ऋग्वेदियों की “भद्रं नो अपि वातय मनः यह एक ही पाद और ऋचा मानी है”॥
Footnote
N/A