Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 11

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- आयुङ्क्ष्वाहिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
न꣡म꣢स्ते अग्न꣣ ओ꣡ज꣢से गृ꣣ण꣡न्ति꣢ देव कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मै꣢र꣣मि꣡त्र꣢मर्दय ॥११॥

न꣡मः꣢꣯ । ते꣣ । अग्ने । ओ꣡ज꣢꣯से । गृ꣣ण꣡न्ति꣢ । दे꣣व । कृष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मैः꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्र꣢म् । अ꣣ । मि꣡त्र꣢꣯म् । अ꣣र्दय ॥११॥

Mantra without Swara
नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः । अमैरमित्रमर्दय ॥

नमः । ते । अग्ने । ओजसे । गृणन्ति । देव । कृष्टयः । अमैः । अमित्रम् । अ । मित्रम् । अर्दय ॥११॥

Samveda - Mantra Number : 11
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप ! परमात्मन् ! (नमः, ते) आपको नमस्कार है (कृष्टयः) भक्त मनुष्य (ओजसे) बल के लिये (गृणन्ति) स्तुति करते हैं (देव) हे सर्व प्रकाशक ! (अमैः) रोगों वा भयों से (अमित्रम्) शत्रु— पापी को (अर्दय) पीड़ित कीजिये॥
तात्पर्य यह है कि परमात्मा की स्तुति करनी चाहिये, इससे आत्मिक बल बढ़ता है और ज्ञान का प्रकाश होता है। और जो लोग परमात्मा से विमुख होकर अधर्माचरण करते हैं वे उसका फल रोगादि दुःख भोगते हैं।
अग्नि के पक्ष में:—(अग्ने) हे अग्ने (ते) तेरे लिये (नमः) अन्नादि की आहुति हो (कृष्टयः) मनुष्य लोग (ओजसे) बल के लिये (गृणन्ति) गुणकीर्त्तन करते हैं (देव) दिव्यप्रभाव ! (अमैः) रोगों वा भयों से (अमित्रम्) [पापी] शत्रु को (अर्दय) नष्ट करो।
अर्थात् अग्नि में अन्न यवादि ओषधियों का होम करना चाहिये जिससे बल की वृद्धि हो। साथ में वेदमन्त्रों द्वारा अग्नि का वर्णन भी करना चाहिये। जिससे अग्नि के गुणों को जानकर रोगादि से बचना ज्ञात हो जावे, जो कि अग्नि के गुण न जानने और वेदोक्त विधि से उपयोग में न लाने वाले और इसी कारण वेदविरुद्ध अधर्माचरण करने वाले पापी जन अनेक प्रकार के रोग तथा भय से पीड़ित होते हैं, इस कारण उसको जान कर यज्ञादि से रोगनिवृत्ति तथा युद्धयज्ञ में आग्नेयास्त्रादि के प्रयोग से शत्रुओं को दूर करना चाहिये॥
निघं० २। ३। २७॥ प्रमाण संस्कृत भाष्य पृष्ठ ३३ प० ७। ११ में देखो॥ ऐसी ही ऋचा ऋग्वेद (८।६४।११) तथा उत्तरार्चिक अ० १७ सूक्त १२ में है॥
प्रश्न–कोई लोग ऐसी शंका करते हैं कि ऋग्वेद के मन्त्र वा सूक्त यजुः साम और अथर्व में आते कहीं-कहीं देखे जाते हैं और इसी प्रकार अन्य वेदों के वाक्य मन्त्र वा सूक्तादि दूसरे वेदों में देखे जाते हैं, तथा एक ही वेद में एक वाक्य मन्त्र वा सूक्तादि अनेक बार आते हैं, सो ऐसा जान पड़ता है कि पूर्व-पूर्व से उत्तरोत्तर में उद्धृत कर लिया गया है।
उत्तर—यदि ऐसा हो तो आपको यह भी शङ्का होनी चाहिये कि काक शब्द में प्रथम ककार आकर फिर कर्पूर शब्द में भी ककार देखा जाता है तो काक शब्द का ककार कर्पूर शब्द में उद्धृत किया गया है ! इसी प्रकार एक अक्षर एक पुस्तक में सहस्रों वा लक्षों बार आता है और एक ही अग्नि वायु आदि शब्द सेंकड़ों बार ग्रन्थों में आते और हम आप सब एक ही शब्द को दिन भर में अनेक वाक्यों में सम्मिलित करके बोलते हैं, तो क्या पूर्वोच्चरित को ही उठा-उठाकर रक्खा करते हैं? यदि नहीं, तो फिर अक्षर, पद वा वाक्य के समान मन्त्र वा सूक्त के द्वितीय बार आने से भी शंका कहाँ रहती है ? यथार्थ यह है कि जिस-जिस अक्षर, पद, वाक्य, मन्त्र वा मूक्त का जितनी बार प्रयोजन आता है उतनी बार उस-उस अक्षर, पद, मन्त्र, वाक्य वा सूक्तादि को पुनः-पुनः एक ही वेद वा अनेक वेदों में प्रयुक्त किया गया है॥
Footnote
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