Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 109

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
तं꣡ गू꣢र्धया꣣꣬ स्व꣢꣯र्णरं दे꣣वा꣡सो꣢ दे꣣व꣡म꣢र꣣तिं꣡ द꣢धन्विरे । दे꣣वत्रा꣢ ह꣣व्य꣡मू꣢हिषे ॥१०९॥

त꣢म् । गू꣣र्धय । स्व꣢꣯र्णरम् । स्वः꣢꣯ । न꣣रम् । देवा꣡सः꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣣रति꣢म् । द꣣धन्विरे । देवत्रा꣢ । ह꣣व्य꣢म् । ऊ꣣हिषे ॥१०९॥

Mantra without Swara
तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे । देवत्रा हव्यमूहिषे ॥

तम् । गूर्धय । स्वर्णरम् । स्वः । नरम् । देवासः । देवम् । अरतिम् । दधन्विरे । देवत्रा । हव्यम् । ऊहिषे ॥१०९॥

Samveda - Mantra Number : 109
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(देवत्रा) वाय्वादि देवों के समीप (हव्यम्) हव्य पदार्थ (ऊहिषे) पहुँचाने के लिये [जिस] (स्वः, नरम्) सुख के नेता (अरतिम्) गतिशील (देवम्) [अग्नि] देव को (देवासः) ऋत्विज् लोग (दधन्विरे) धरते, प्राप्त होते हैं (तम्) उसको [तू भी] (गूर्धय) वर्णित कर॥
ईश्वर पक्ष में—(देवत्रा) दिव्य शरीरों में (हव्यम्) भोक्तव्य कर्म फल (ऊहिषे) पहुँचाने के लिये, जिस (स्वः, नरम्) सुख के, नेता (अरतिम्) व्यापक (देवम्) परमात्मा देव को (देवासः) विद्वान् योगीजन (दधन्विरे) प्राप्त होते हैं (तम्) उसको तू भी (गूर्धय) वणित कर।
Footnote
अष्टाध्यायी ६।३।१३७॥ ५।४।५६॥ ३।४।९॥ निघं० २।१४ के प्रमाण तथा सायणाचार्य और ज्वालाप्रसाद जी की भूल संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। १९। १ में “ओहिंरे” पाठ है॥