Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1085

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ घ꣣ त्वा꣢वान्꣣ त्म꣡ना꣢ यु꣣क्तः꣢ स्तो꣣तृ꣡भ्यो꣢ धृष्णवीया꣣नः꣢ । ऋ꣣णो꣢꣫रक्षं꣣ न꣢ च꣣꣬क्र्योः꣢꣯ ॥१०८५॥

आ । घ꣣ । त्वा꣡वा꣢꣯न् । त्म꣡ना꣢꣯ । यु꣣क्तः꣢ । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । धृ꣣ष्णो । ईयानः꣢ । ऋ꣣णोः꣢ । अ꣡क्ष꣢꣯म् । न । च꣣क्र्योः꣢ ॥१०८५॥

Mantra without Swara
आ घ त्वावान् त्मना युक्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवीयानः । ऋणोरक्षं न चक्र्योः ॥

आ । घ । त्वावान् । त्मना । युक्तः । स्तोतृभ्यः । धृष्णो । ईयानः । ऋणोः । अक्षम् । न । चक्र्योः ॥१०८५॥

Samveda - Mantra Number : 1085
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(धृष्णो) हे घर्षणक्षम ! परमात्मन् ! (त्वावान्) आप-सा [न त्वावां) अन्यः इत्यादि श्रुत्यन्तर के उपरोध से आप सा अन्य कोई नहीं। अतः आप ही] (ईयानः) प्रार्थना किये हुए (त्मना) चेतना स्वरूप से (युक्तः) युक्त (रतोतृभ्यः) हम उपासकों के लिये (घ) अवश्य (आ ऋणोः) सर्वतः सब कुछ देवें (न) जैसे (शक्रयोः) रथ के दोनों पहियों की (अक्षम्) नाभि सबका केन्द्र होकर सब अरों प्रत्यरों का उपकार करती है। ऐसे ही आप भी सब प्रार्थियों की प्रार्थनाओं के केन्द्रभूत हैं। सब की सुनते हैं॥
Footnote
ऋ० १। ३०। १४ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥