Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1073

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ हि꣢꣫ स्थ ऋ꣣त्वि꣢जा꣣ स꣢स्नी꣣ वा꣡जे꣢षु꣣ क꣡र्म꣢सु । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ त꣡स्य꣢ बोधतम् ॥१०७३॥

य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । हि । स्थः । ऋ꣣त्वि꣡जा꣢ । सस्नी꣢꣯इ꣡ति꣢ । वा꣡जे꣢꣯षु । क꣡र्म꣢꣯सु । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । बो꣣धतम् ॥१०७३॥

Mantra without Swara
यज्ञस्य हि स्थ ऋत्विजा सस्नी वाजेषु कर्मसु । इन्द्राग्नी तस्य बोधतम् ॥

यज्ञस्य । हि । स्थः । ऋत्विजा । सस्नीइति । वाजेषु । कर्मसु । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । तस्य । बोधतम् ॥१०७३॥

Samveda - Mantra Number : 1073
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नीं) हे इन्द्र और अग्ने ! तुम दोनों (हि) निश्चय (यज्ञस्य) ज्योतिष्टोमादि यज्ञ के (ऋत्विजा) ऋतु ऋतु में यजनीय (स्थः) हो अतः (वाजेषु) प्राप्तव्य बलों और (कर्मसु) यज्ञ क्रियाओं में (सस्नी) न्हाये हुए = चतुर (नस्य) उस हमारे किये यज्ञ को (बोधतम्) जानो॥
यहाँ श्लेषालंकार से सूर्य और अग्नि के दृष्टान्त से सूर्य तुल्य प्रकाश गुरु और अग्नि तुल्य प्रकाश शिष्य भी समझने योग्य हैं॥
Footnote
ऋ० ८। ३८। १ में भी॥