Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 107

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठाय गायत ऋ꣣ता꣡व्ने꣢ बृह꣣ते꣢ शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । उ꣣पस्तुता꣡सो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१०७॥

प्र꣢ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठाय । गा꣣यत । ऋता꣡व्ने꣢ । बृ꣣हते꣢ । शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । शु꣣क्र꣢ । शो꣣चिषे । उपस्तुता꣡सः꣢ । उ꣣प । स्तुता꣡सः꣢अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१०७॥

Mantra without Swara
प्र मꣳहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे । उपस्तुतासो अग्नये ॥

प्र । मँहिष्ठाय । गायत । ऋताव्ने । बृहते । शुक्रशोचिषे । शुक्र । शोचिषे । उपस्तुतासः । उप । स्तुतासःअग्नये ॥१०७॥

Samveda - Mantra Number : 107
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(उपस्तुतामः) हे वर्णनीय अग्नि के समीपवर्त्तियो ! तुम (मंहिष्ठाय) अत्यन्त बढ़े और बढ़ाने वाले (ऋताव्ने) यज्ञ वाले (बृहते, शुक्रशोचिषे) बड़े शुक्र तेज वाले (अग्नये) अग्नि वा परमेश्वर के लिये (प्र, गायत) [उसके गुण] वर्णित करो॥
Footnote
अष्टाध्यायी ५।३।५९॥ ६।४।५४॥ निघं० ५।४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। ९२। ८ में भी॥