Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1067

1875 Mantra
Devata- आदित्याः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ति꣢ वा꣣ꣳसू꣢र꣣ उ꣡दि꣢ते मि꣣त्रं꣡ गृ꣢णीषे꣣ व꣡रु꣢णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢ꣳ रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥

प्र꣡ति꣢꣯ । वा꣣म् । सू꣡रे꣢꣯ । उ꣡दि꣢꣯ते । उत् । इ꣣ते । मित्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । गृ꣣णीषे । व꣡रु꣢꣯णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢म् । रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥

Mantra without Swara
प्रति वाꣳसूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम् । अर्यमणꣳ रिशादसम् ॥

प्रति । वाम् । सूरे । उदिते । उत् । इते । मित्रम् । मि । त्रम् । गृणीषे । वरुणम् । अर्यमणम् । रिशादसम् ॥१०६७॥

Samveda - Mantra Number : 1067
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
मैं यजमान ! (मित्रम्) प्राण और (वरुणम्) अपान इन (वाम्) दोनों को (प्रति) प्रत्येक को जो (रिशावसम्) शत्रुओं को दबा सकने वाले और (अर्यमणम्) न्याय के समर्थक हैं इन को (सूरे) सूर्य (उदिते) उदय होते ही प्रतिदिन प्रातः काल (गृणीषे) स्तुत करता हूँ॥
Footnote
प्राण और अपान के संयम से मनुष्य शत्रुओं से नहीं दबता, उन्हें दबा सकता है, अन्याय को रोककर न्यायधर्म का प्रचार कर सकता है। इसलिये उसको नित्य उठते ही प्रातःकाल शौचादि आवश्यक कार्य से निवृत्त होकर प्राणाऽपान के संयम का चिन्तवन करना चाहिये। जैसा कि ऋग्वेद ७। ४१। १ में भी लिखा है कि “प्रातरग्निं प्रातरिन्द्र हवामहे। प्रातमित्रावरुणा प्रातरश्विना०” इत्यादि॥ ऋ० ७। ६६। ७ में भी॥