Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 106

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
श्रु꣣꣬ष्ट्य꣢꣯ग्ने꣣ नव꣢स्य मे स्तो꣡म꣢स्य वीर विश्पते । नि꣢ मा꣣यि꣢न꣣स्त꣡प꣢सा र꣣क्ष꣡सो꣢ दह ॥१०६॥

श्रु꣣ष्टी꣢ । अ꣣ग्ने । न꣡व꣢꣯स्य । मे꣣ । स्तो꣡म꣢꣯स्य । वी꣣र । विश्पते । नि꣢ । मा꣣यि꣡नः꣢ । त꣡प꣢꣯सा । र꣣क्ष꣡सः । द꣣ह ॥१०६॥

Mantra without Swara
श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे स्तोमस्य वीर विश्पते । नि मायिनस्तपसा रक्षसो दह ॥

श्रुष्टी । अग्ने । नवस्य । मे । स्तोमस्य । वीर । विश्पते । नि । मायिनः । तपसा । रक्षसः । दह ॥१०६॥

Samveda - Mantra Number : 106
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वीर) हे अनन्त पराक्रम ! (विश्पते) हे प्रजानाथ ! (अग्ने) परमात्मन् (मे) मेरे (नवस्य) अभी अनुष्ठान किये हुए (स्तोमस्य) सूक्त पाठ के (मायिनः) छलिया शत्रु (रक्षसः) राक्षसों को (तपसा) अपने तेज से (नि) नितराम (दह) भस्म कीजिये॥
भौतिक पक्ष में—(वीर) तीव्रता युक्त ! (विश्पते) प्रजा के रक्षक ! (अग्ने) अग्ने ! (मे, नवस्य, स्तोमस्य) मेरे, सम्प्रति के, स्तोत्र के (मायिनः) छलिया शत्रु (रक्षसः) राक्षसों कों (तपसा, नि, वह) तेज से, निरा, भस्म कर॥
अर्थात् वेदपाठ तथा वैदिकधर्म प्रचार के रोकने वाले विघ्नरूप शत्रु अग्नि का भले प्रकार उपयोग लेने से निरे भस्म अर्थात् निवृत्त हो जाते हैं।
Footnote
निरुक्त ६। १२ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८।२३।१४ में “तपसा” के स्थान में “तपुषा” पाठ है॥