Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1044

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣢ त्वा꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢य उ लोककृ꣣त्नु꣡मी꣢महे । त꣢व꣣ प्र꣡श꣢स्तये म꣣हे꣢ ॥१०४४॥

तम् । त्वा꣣ । म꣡दा꣢꣯य । घृ꣡ष्व꣢꣯ये । उ꣣ । लोककृत्नु꣢म् । लो꣣क । कृत्नु꣢म् । ई꣣महे । त꣡व꣢꣯ । प्र꣡श꣢꣯स्तये । प्र । श꣣स्तये । म꣢हे ॥१०४४॥

Mantra without Swara
तं त्वा मदाय घृष्वय उ लोककृत्नुमीमहे । तव प्रशस्तये महे ॥

तम् । त्वा । मदाय । घृष्वये । उ । लोककृत्नुम् । लोक । कृत्नुम् । ईमहे । तव । प्रशस्तये । प्र । शस्तये । महे ॥१०४४॥

Samveda - Mantra Number : 1044
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हम यजमान लोग (लोककृत्नुम्) दृष्टि से सहायक (तम्) उस पूर्वोक्त वाणी सुधारने वाले बल पराक्रमादि वर्धक (त्वा) तुझ सोम को (उ) निश्चय (तब) तुझ सोम की (महे प्रशस्तये) बड़ी प्रशंसा के लिये तथा (धृष्वये) शत्रुओं को रगड़ डालने में समर्थ (मदाय) हृष्टि पुष्टि के लिये (ईमहे) चाहते हैं। अर्थात् मनुष्यों को दृष्टि, वाणी, बल, शत्रुनाश इत्यादि प्रयोजनों के लिये सोम रस की इच्छा करनी चाहिये॥
Footnote
ऋ० ९। २। ८ के पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥