Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 104

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
न꣡ तस्य꣢꣯ मा꣣य꣡या꣢ च꣣ न꣢ रि꣣पु꣡री꣢शीत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । यो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ द꣣दा꣡श꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये ॥१०४॥

न꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । मा꣣य꣡या꣢ । च꣣ । न꣢ । रि꣣पुः꣢ । ई꣣शीत । म꣡र्त्यः꣢꣯ । यः । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । द꣣दा꣡श꣢ । ह꣣व्य꣡दा꣢तये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये ॥१०४॥

Mantra without Swara
न तस्य मायया च न रिपुरीशीत मर्त्यः । यो अग्नये ददाश हव्यदातये ॥

न । तस्य । मायया । च । न । रिपुः । ईशीत । मर्त्यः । यः । अग्नये । ददाश । हव्यदातये । हव्य । दातये ॥१०४॥

Samveda - Mantra Number : 104
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः, मर्त्यः) जो, मनुष्य (हव्यदातये) देवों को हव्य देने के लिए (अग्नये, ददाश) अग्नि को, देता है (तस्य, रिपुः) उसका, शत्रु (मायया, चन) छल बुद्धि से, भी (न, ईशीत) नहीं, कुछ कर सकता॥
प्रायः निर्बुद्धि मनुष्यों को शत्रु लोग छल से जीत लेते हैं, परन्तु जो मनुष्य पूर्वोक्त प्रकार से अग्नि में होम करके उससे उत्पन्न हुए शुद्ध पवन के सेवन से शुद्ध-बुद्धियुक्त हो जाता है, वह दुष्ट शत्रुओं के वश में नहीं आता। यह उपदेश है।
Footnote
ऋ० ८। २३। १५ में “हव्यदातिभिः” इतना पाठभेद है॥