Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1038

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ व꣢च्यस्व꣣ म꣢हि꣣ प्स꣢रो꣣ वृ꣡षे꣢न्दो द्यु꣣म्न꣡व꣢त्तमः । आ꣡ योनिं꣢꣯ धर्ण꣣सिः꣡ स꣢दः ॥१०३८॥

आ । व꣣च्यस्व । म꣡हि꣢꣯ । प्स꣡रः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢꣯ । इ꣣न्दो । द्युम्न꣡व꣢त्तमः । आ । यो꣡नि꣢꣯म् । ध꣣र्णसिः꣢ । स꣣दः ॥१०३८॥

Mantra without Swara
आ वच्यस्व महि प्सरो वृषेन्दो द्युम्नवत्तमः । आ योनिं धर्णसिः सदः ॥

आ । वच्यस्व । महि । प्सरः । वृषा । इन्दो । द्युम्नवत्तमः । आ । योनिम् । धर्णसिः । सदः ॥१०३८॥

Samveda - Mantra Number : 1038
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) सोम ! (वृषा) वृष्टिकारक, इसी से (द्युम्नवतमः) अत्यन्त धन-धान्यवान् और इसी से (धर्णसिः) विश्व का धारक तू (महि) बहुत (प्सरः) जल और (अन्धः) अन्न को (आवच्यस्व) हमें प्राप्त करा और तू (योनिम्) अपने स्थान आकाश में (आसदः) विराज॥
भावार्थ — यह है कि यज्ञ में प्रयुक्त आहुति को प्राप्त हुआ सोम प्रकाशस्थ होकर धन धान्यादि का समृद्धिकारक हो जाता है॥
Footnote
ऋ० ९। २। २ में भी॥