Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1037

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व देव꣣वी꣡रति꣢꣯ प꣣वि꣡त्र꣢ꣳ सोम꣣ र꣡ꣳह्या꣢ । इ꣡न्द्र꣢मिन्दो꣣ वृ꣡षा वि꣢꣯श ॥१०३७॥

प꣡व꣢꣯स्व । दे꣣ववीः꣡ । दे꣣व । वीः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । सो꣣म । र꣡ꣳह्या꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इ꣣न्दो । वृ꣡षा꣢꣯ । वि꣣श ॥१०३७॥

Mantra without Swara
पवस्व देववीरति पवित्रꣳ सोम रꣳह्या । इन्द्रमिन्दो वृषा विश ॥

पवस्व । देववीः । देव । वीः । अति । पवित्रम् । सोम । रꣳह्या । इन्द्रम् । इन्दो । वृषा । विश ॥१०३७॥

Samveda - Mantra Number : 1037
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) गीले ! (सोम) सोम ! (देववीः) देवों का चाहा (वृषा) वृष्टिकारक तू (रंह्या) वेग से (पवित्रम्) पवित्रता के लिये (अति पवस्व) वर्ष और (इन्द्रम्) वृष्टिकारक वायु में (आविश) प्रवेश कर॥
अर्थात् गीला सोम अग्नि में होम कर वृष्टि चाहने वाले यजमान को वृष्टिकारक वायु में प्रविष्ट कराना चाहिये॥
Footnote
ऋ० ९। २। १ में भी॥