Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1014

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्रि꣣त꣡स्य꣢ पा꣣ष्यो꣢३꣱र꣡भ꣢क्त꣣ य꣡द्गुहा꣢꣯ प꣣द꣢म् । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ स꣣प्त꣡ धाम꣢꣯भि꣣र꣡ध꣢ प्रि꣣य꣢म् ॥१०१४॥

उ꣡प꣢꣯ । त्रि꣣त꣡स्य꣢ । पा꣣ष्योः꣢ । अ꣡भ꣢꣯क्त । यत् । गु꣡हा꣢꣯ । प꣡द꣢म् । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । स꣣प्त꣢ । धा꣡म꣢꣯भिः । अ꣡ध꣢꣯ । प्रि꣣य꣢म् ॥१०१४॥

Mantra without Swara
उप त्रितस्य पाष्यो३रभक्त यद्गुहा पदम् । यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम् ॥

उप । त्रितस्य । पाष्योः । अभक्त । यत् । गुहा । पदम् । यज्ञस्य । सप्त । धामभिः । अध । प्रियम् ॥१०१४॥

Samveda - Mantra Number : 1014
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(त्रितस्य) विद्या शिक्षा धर्म विषयों को विस्तृत करने वाले विद्वान् ऋत्विज् के यहां [निरुक्त ४। ६] (गुहा) हविर्धान में वर्त्तमान (पाष्योः) पाषाण के समान कठिन दो-दो अधिषवण फलकों में (यत् पदम्) जिस सोम पद को (उप अभक्त) अध्वर्यु सामीप्य से सेवित करता है (अध) फिर उस (प्रियम्) प्यारे सोम को (सप्त) सात (भामभिः) धारक गायत्र्यादि छन्दों से प्रशंसित करते हैं॥
Footnote
ऋ० ९। १०२। २ में भी॥