Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 101

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ज꣣ज्ञानः꣢ स꣣प्त꣢ मा꣣तृ꣡भि꣢र्मे꣣धा꣡माशा꣢꣯सत श्रि꣣ये꣢ । अ꣣यं꣢ ध्रु꣣वो꣡ र꣢यी꣣णां꣡ चि꣢केत꣣दा꣢ ॥१०१॥

ज꣣ज्ञानः꣢ । स꣣प्त꣢ । मा꣣तृ꣡भिः꣢ । मे꣣धा꣢म् । आ । अ꣣शासत । श्रिये꣢ । अ꣣य꣢म् । ध्रु꣣वः꣢ । र꣣यीणा꣢म् । चि꣣केतत् । आ꣢ ॥१०१॥

Mantra without Swara
जज्ञानः सप्त मातृभिर्मेधामाशासत श्रिये । अयं ध्रुवो रयीणां चिकेतदा ॥

जज्ञानः । सप्त । मातृभिः । मेधाम् । आ । अशासत । श्रिये । अयम् । ध्रुवः । रयीणाम् । चिकेतत् । आ ॥१०१॥

Samveda - Mantra Number : 101
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) यह पवन (सप्त) सात (मातृभिः) माताओं से (जज्ञानः) जन्मा हुआ (श्रिये) लक्ष्मी के लिए (मेधाम्) स्थिर बुद्धि को (आशासत) सर्वथा चाहता है और तब (ध्रुवः) स्थिरात्मा [यजमान] (रयीणाम्) धनों के (आ, चिकेतत्) विचार को, सब ओर से कर सकता है।
अर्थात् मुण्डकोपनिषद् के लेखानुसार जो अग्नि में सात प्रकार की लपटें उठती हैं, उनसे एक ऐसा वायु [पवमान] शोधने वाला उत्पन्न होता है जो कि हवनजन्य गुणों को लिये हुए मनुष्यों के बुद्धितत्त्व की शुद्धि चाहता है। अर्थात् उससे बुद्धितत्त्व में भी पवित्रता उत्पन्न होती है, जिसकी सहायता से व्यवसायात्मक मनुष्य विद्या सुवर्णादि धन लक्ष्मी के लिए उसके विषय में स्थिर विचार कर सकता है। जड़ पवन में इच्छा का व्यवहार इसी प्रकार जानो जिस प्रकार “दीवार गिरना चाहती है” इत्यादि में होता है।
Footnote
मुण्डकोपनिषद् १।२।४॥ अष्टाध्यायी २।४।७३॥ १।४।७९ के प्रमाण तथा ऋग्वेद ९।१०२।४ में जितना पाठ में अन्तर है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद के पाठ में “मेधाम्” की जगह वेधाम् पाठ है और सायणाचार्य ने “मेधां” का भी वही अर्थ किया जो कि वह ऋग्वेद में “वेधां” का कर चुके थे, यह विचारणीय है। तथा उन्होंने “आशासत” इस पद की जगह “अनुशासत” का अर्थ किया है। और उनकी देखा-देखी पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव ने भी “मक्षिका स्थाने मक्षिका” ही घसीटा है।
यद्यपि इस मन्त्र का अग्नि देवता मानकर भी व्याख्या ठीक हो सकती थी, परन्तु परम्परा के अनुरोध से हमने भी पवनपरक व्याख्या की है॥