Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1001

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु꣣व꣡ꣳ हि स्थः स्वः꣢꣯पती꣣ इ꣡न्द्र꣢श्च सोम꣣ गो꣡प꣢ती । ई꣣शाना꣡ पि꣢प्यतं꣣ धि꣡यः꣢ ॥१००१॥

युव꣢म् । हि । स्थः । स्व꣢पती । स्वाऽ३रि꣡ति꣢ । प꣣तीइ꣡ति꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣣ । सोम । गो꣡प꣢꣯ती । गो । प꣣तीइ꣡ति꣢ । ई꣣शा꣢ना । पि꣣प्यतम् । धि꣡यः꣢꣯ ॥१००१॥

Mantra without Swara
युवꣳ हि स्थः स्वःपती इन्द्रश्च सोम गोपती । ईशाना पिप्यतं धियः ॥

युवम् । हि । स्थः । स्वपती । स्वाऽ३रिति । पतीइति । इन्द्रः । च । सोम । गोपती । गो । पतीइति । ईशाना । पिप्यतम् । धियः ॥१००१॥

Samveda - Mantra Number : 1001
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) सोम ! तू (च) और (इन्द्रः) सूर्य (हि) ही (स्वःपति) सुख के स्वामी और (गोपती) इन्द्रियों के पोषक (स्थः) हो (ईशाना) शक्तिमान् (युवम्) तुम दोनों (धियः) कर्मों वा बुद्धियों को (पिप्यतम्) समृद्ध करो॥
Footnote
ऋ० ९। १६। २ में भी॥
उक्तो माध्यन्दिनः पवमानः इति विवरणकृत्॥
सत्यव्रत सामश्रमी जी लिखते हैं कि "इससे आगे विवरणकार ने शक्वरी रख कर उन्हीं की व्याख्या की है। जैसा कि “अब पृष्ठों का वर्णन है, उसमें पांचवें दिन शक्वरियां पृष्ठ हैं सो कही जाती हैं—छन्द, देवता, ब्राह्मरण परिभाषानुसारी जानो। ‘विदा मघवन्’ सर्वज्ञ इन्द्र ! तू इत्यादि, पर विवरणकार की सम्मति में महानाम्न्यार्चिक उत्तरार्चिक के ही अन्तर्गत है, अन्य ग्रन्थ के अनुसार छन्दआर्चिक का परिशिष्ट नहीं। परन्तु यह बड़ा आश्चर्य है कि यह मूल पुस्तक देखने के विपरीत है”॥