Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 100

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ य꣡जि꣢ष्ठो अध्व꣣रे꣢ दे꣣वा꣡न् दे꣢वय꣣ते꣡ य꣢ज । हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ वि रा꣢꣯ज꣣स्य꣢ति꣣ स्रि꣡धः꣢ ॥१००॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । य꣡जि꣢꣯ष्ठः । अ꣣ध्वरे꣢ । दे꣣वा꣢न् । दे꣣वयते꣢ । य꣣ज । हो꣡ता꣢꣯ । म꣣न्द्रः꣢ । वि । रा꣣जसि । अ꣡ति꣢꣯ । स्रि꣡धः꣢꣯ ॥१००॥

Mantra without Swara
अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवान् देवयते यज । होता मन्द्रो वि राजस्यति स्रिधः ॥

अग्ने । यजिष्ठः । अध्वरे । देवान् । देवयते । यज । होता । मन्द्रः । वि । राजसि । अति । स्रिधः ॥१००॥

Samveda - Mantra Number : 100
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) प्रकाशस्वरूप ! (यजिष्ठः) अत्यन्त यज्ञ करने वाले (होता) फलदाता (मन्द्रः) आनन्ददायक [आप] (देवयते) देव की कामना वाले के लिये (देवान्) इन्द्रियों को (यज) संगत कराइये और (स्त्रिधः) कामादि शत्रुओं को (अति) उल्लंघित करके (अध्वरे) उपासना में (वि-राजसि) विशेष प्रकाश कीजिये॥
भौतिक पक्ष में— (अग्ने) अग्ने ! (यजिष्ठः) अत्यन्त यज्ञकारक (होता) हव्य पहुँचाने वाला (मन्द्रः) सुखदायक [तू] (देवयते) वाय्वादि देवों की कामना वाले के लिए (देवान्) वायु आदि को (यज) संगत करता और (मध्वरे) यज्ञ में (त्रिधः) रोगादि शत्रुओं को (अति) उल्लंघित करके (विराजसि) विशेष प्रकाश करता है।
अर्थात् गतिशील होने से अग्नि उस-उस पदार्थ का उस-उस स्थान में पहुँचाने वाला, वाय्वादि को ठीक करने वाला, उसकी विद्या रखने वालों को सुखदायक और विरोधी दुष्ट रोग वा दस्यु आदि को नष्ट करके प्रकाशित होने वाला है॥
Footnote
ऋग्वेद ३।१०।७ में भी ऐसा ही पाठ है॥