Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 10

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्व꣣दा꣡ भ꣢रा꣣स्म꣡भ्य꣢मू꣣त꣡ये꣢ म꣣हे꣢ । दे꣣वो꣡ ह्यसि꣢꣯ नो दृ꣣शे꣢ ॥१०

अ꣡ग्ने꣢꣯ । वि꣡व꣢꣯स्वत् । वि । व꣣स्वत् । आ꣢ । भ꣣र । अस्म꣡भ्य꣢म् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । म꣣हे꣢ । दे꣣वः꣢ । हि । अ꣡सि꣢꣯ । नः꣢ । दृशे꣢ ॥१०॥

Mantra without Swara
अग्ने विवस्वदा भरास्मभ्यमूतये महे । देवो ह्यसि नो दृशे ॥१०

अग्ने । विवस्वत् । वि । वस्वत् । आ । भर । अस्मभ्यम् । ऊतये । महे । देवः । हि । असि । नः । दृशे ॥१०॥

Samveda - Mantra Number : 10
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे अग्ने ! ( महे ) बड़ी पूरी ( ऊतये ) रक्षा के लिये ( विवस्वत् ) सुख में रखने वाले यज्ञादि को ( अस्मभ्यम् ) हमारे लिये (आ-भर ) सिद्ध कराइये ( हि ) क्योंकि (नः) हमारे ( दृशे ) देखने के लिये (देवः) प्रकाशक ( असि ) हो ।
तात्पर्य यह है कि अग्नि से बड़ी रक्षा और सुख सम्पादन करना चाहिये । तथा अग्नि ही की सहायता से नेत्रेन्द्रिय की उत्पत्ति से देखने का काम सिद्ध होता है सो करना चाहिये । और यज्ञ वा शिल्प कर्म से सुख में निवास करना चाहिये ॥
ईश्वरपक्ष में:— ( अग्ने ) हे जगदीश ! (महे) पूर्ण (ऊतये ) रक्षा के लिये (विवस्वत्) सुख में वसाने वाले यज्ञादि कर्म को (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (आ—भर) पूर्ण कीजिये [ क्योंकि आप ही ] ( नः ) हमारे ( दृशे ) देखने के लिये ( देवः ) प्रकाशक ( असि ) हैं ॥
अर्थात्—परमात्मन् ! यज्ञादि कार्यों में हमारी सहायता कीजिये जिस से हम सुख में निवास करें। आप ही बड़े भारी रक्षक और मार्ग दिखाने वाले हैं। आपने ही ज्ञान और आँख आदि इन्द्रियाँ दी हैं, वे इन्द्रियाँ भी आप ही की सहायता से अपने काम करने में समर्थ होती हैं ।
Footnote
अष्टाध्यायी ३ । ३ । ९७ सूत्र संस्कृतभाष्य पृष्ठ ३१ पं० २४ में देखिये ॥