Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्न꣣ आ꣡ या꣢हि वी꣣त꣡ये꣢ गृणा꣣नो꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये । नि꣡ होता꣢꣯ सत्सि ब꣣र्हि꣡षि꣢ ॥१॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । आ । या꣣हि । वीत꣡ये꣢ । गृ꣣णानः꣢ । ह꣣व्य꣡दा꣢तये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये । नि꣢ । हो꣡ता꣢꣯ । स꣣त्सि । बर्हि꣡षि꣢ ॥१॥

Mantra without Swara
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि ॥

अग्ने । आ । याहि । वीतये । गृणानः । हव्यदातये । हव्य । दातये । नि । होता । सत्सि । बर्हिषि ॥१॥

Samveda - Mantra Number : 1
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाश के पुञ्ज ! ( वीतये) कान्ति प्रक्षेप वा हव्य खाने के लिये (आयाहि) प्राप्त हूजिये । कैसे हो तुम ? (गृणानः) स्तुति किये हुए और (होता) हव्यपदार्थों के लेने वाले हो । (बर्हिषि) यज्ञ में (नि, सत्सि ) विराजिये (हव्यदातये) वायु आदि देवों को हव्य देने = पहुँचाने के लिये ।
इस प्रकार के मन्त्रों में “हे अग्ने” इत्यादि सम्बोधन के व्यवहार को देख कर कोई लोग शङ्का करते हैं कि “वेदों में विशेष करके अचेतन जड़ों का सम्बोधन देखा जाता है सो किस कारण ?"
उत्तर — निरुक्त (अध्याय ७ । खं० १) में लिखा है कि वेद में तीन प्रकार की ऋचा हैं । १—परोक्षकृता २–प्रत्यक्षकृता और ३—आध्यात्मिकी । फिर उसी निरुक्त (७ । २) में लिखा है कि १— प्रत्यक्षकृता वे हैं जिनमें मध्यम पुरुष का योग है और “त्वम्” इस सर्वनाम से व्यवहार है । इसीलिये वेदों में अग्नि आदि प्रत्यक्ष देवताओं (व्यावहारिकों) का मध्यम पुरुष के प्रयोगों और “तुम” इस सर्वनाम से सम्बोधन करके वर्णन किया है । अर्थात् वेद की यह शैली ( मुहावरा ) है कि प्रत्यक्ष अग्न्यादि पदार्थों का वर्णन इस ढंग से किया जाता है। ऐसा ही आगे भी सर्वत्र जानो । बार—बार न लिखेंगे । तात्पर्य यह है कि अग्नि को अग्निकुण्ड में बुलाना अर्थात् आाधान करना चाहिये इस लिये कि होमे हुए द्रव्यों को वायु आदि में फैलावे और हुतद्रव्यों को प्रक्षेप करके फैलाने वा भक्षण करने के लिये । प्र०—वह अग्नि कैसा है ? उ०—जिस की स्तुति की जाती है । प्र०–अग्नि आदि जड़ पदार्थों की स्तुति से क्या फल है ? उ०—जिस प्रकार परमेश्वर की स्तुति अर्थात् गुणानुवाद करने से उसमें श्रद्धा उत्पन्न होती है इसी प्रकार अग्नि आदि जड़ पदार्थों के गुण वर्णन करने से उन गुणों के द्वारा उपकार लेने की श्रद्धा उत्पन्न होती है अर्थात् होमादि करने का क्या फल है, शिल्पादि में अग्नि क्या काम देता है, इत्यादि विदित होता है । इस लिये गुणकीर्त्तन व्यर्थ नहीं । इस मन्त्र का अग्नि देवता है अर्थात् अग्नि का इसमें वर्णन = स्तुति है । अग्नि शब्द मुख्य करके परमात्मा का वाचक है इसलिये ईश्वरपक्ष के श्लेषालङ्कार वाले अर्थ में यह आशय होगा कि—
हे (अग्ने) प्रकाशमय ! आप हमारे (बर्हिषि) यज्ञ में अर्थात् ज्ञानयज्ञरूप ध्यान में (आयाहि) प्राप्त हूजिये, (गृणानः) आप स्तुत किये हुए हैं, (होता) आप सबको सब पदार्थों के दाता हैं। (नि, सत्सि) विराजिये । किस लिये ? ( वीतये) हृदय में प्रकाश करने के लिये और (हव्यदातये) भक्ति का फल देने के लिये ॥
वेदों में प्रायः श्लेषालङ्कार* है जिससे दो अर्थ होते हैं, जिनमें से परमार्थविषयक ईश्वरार्थ तो मुख्य ही है । क्योंकि कठोपनिषद् (२ । ५) में लिखा है कि:— [सर्वे वेदा यत्० ] “समस्त वेद जिस पद का सब प्रकार से मनन करते हैं वह ओंकार है” ओ३म् परमात्मा का नाम है । जैसा कि योगशास्त्र में लिखा है कि “परमात्मा का वाचक प्रणव ओङ्कार है ( १ । २७)” तो जब कि अग्नि आदि पदों से परमात्मा का ग्रहण किया जावे तभी यह ठीक घट सकता है कि समस्त वेद परमात्मा का वर्णन करते हैं। वास्तव में प्रकाशादि जो दिव्य गुण हैं सो परमात्मा में असीम ( बेहद्द ) भाव से वर्त्तमान हैं इसलिये अग्नि आदि पदों का मुख्य अर्थ तो परमात्मा ही है परन्तु वे प्रकाशादि गुण ससीम ( हद्दवाले) होकर अग्नि आदि भौतिक पदार्थों में भी किसी अंश तक रहते हैं इस लिये उस अंश में वे भौतिक पदार्थ देवता कहे जाते हैं । इसी लिये सम्पूर्ण देवतावाचक पदों से पूर्ण भाव में तो परमात्मा ही वेदों में विवक्षित है परन्तु योगिकार्थ से किसी अंश तक भौतिक पदार्थ भी विवक्षित जानने चाहियें ॥
इस प्रकार सब जगह देवता शब्द से उस मन्त्र का वर्णन किया पदार्थ और ऋषि शब्द से उस-उस मन्त्र के अर्थ का अनुभव करने वाला ऋषि, तथा स्तुति शब्द से उस के गुणों का वर्णन ( बयान), और सम्बोधन से उस उस पदार्थ का प्रत्यक्ष होना, समझना चाहिये । यह ठीक स्मरण रखना चाहिये क्योंकि आगे बार-बार यह नहीं लिखा जायगा । यह ऋचा ऋग्वेद मं० ६ । सूक्त १६ । ऋ० १० में भी ज्यों की त्यों है ॥ १ ॥
Footnote
*श्लेषालङ्कार के २ भेद हैं, शब्दश्लेष और अर्थश्लेष । जिनमें से अर्थश्लेष वह कहाता है जिसमें एक पद वा वाक्य में अनेक अर्थ हों ॥