Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 995

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣प्सा꣡ इन्द्रा꣢꣯य वा꣣य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । सो꣡मा꣢ अर्षन्तु꣣ वि꣡ष्ण꣢वे ॥९९५॥

अ꣣प्साः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वा꣣य꣡वे꣢ । व꣡रु꣢꣯णाय । म꣣रु꣡द्भयः꣢ । सो꣡माः꣢꣯ । अ꣣र्षन्तु । वि꣡ष्ण꣢꣯वे ॥९९५॥

Mantra without Swara
अप्सा इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः । सोमा अर्षन्तु विष्णवे ॥

अप्साः । इन्द्राय । वायवे । वरुणाय । मरुद्भयः । सोमाः । अर्षन्तु । विष्णवे ॥९९५॥

Samveda - Mantra Number : 995
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
रेतस् जलों का ही रूप है । रेतस् ही सोम है, जो रस-रुधिरादि क्रम से शरीर में उत्पन्न होता है। सोम ही ‘अप्सा:' है, क्योंकि ये ‘अपां सारभूतो रस: ' =जलों का सारभूत रस है ।‘अप्साः' का अर्थ ‘नाश न करनेवाले' [not destroying] भी है। ये सोम ही शरीर में धारकतत्त्व है। ये (अप्साः) = अविनाशक व धारक सोमाः-सोम अर्षन्तु शरीर में ही गतिवाले हों – शरीर में ही रुधिर में व्याप्त होकर प्रवाहित हों । किसलिए - 

१. (इन्द्राय) = इन्द्र के लिए, परमैश्वर्य की प्राप्ति के लिए। मानव शरीर में जो कुछ भी उत्कर्ष प्राप्त करना है, उस सबका मूल इस सोम-वीर्यशक्ति में ही है।

२. (वायवे) = गतिशीलता के लिए [वा गतौ ] । शरीर की स्फूर्ति सोम पर ही निर्भर करती है । , ३. वरुणाय = वरुण के लिए । 'वरुणो नाम वरः • श्रेष्ठता के लिए । कामादि हीन भावनाओं के निवारण के लिए ।

४. (मरुद्भ्यः) = प्राणों के लिए । प्राणशक्ति की वृद्धि के लिए । सोम ही तो प्राण हैं - इनके अभाव में तो मृत्यु है ।

५. (विष्णवे) = [विष् व्याप्तौ] व्यापकता के लिए, मनोवृत्ति को विशाल बनाने के लिए भी सोमरक्षा आवश्यक है ।

‘इन्द्र, वायु, वरुण, मरुत् व विष्णु' ये सब नाम उस प्रभु के हैं। उस - उस नाम से प्रभु का स्मरण अमुक-अमुक गुण के धारण के लिए ही है। इन सब गुणों का धारण सोमरक्षा पर ही निर्भर करता है। ये सोम ही 'अप्साः'=अविनाशक व धारक हैं। इन्हीं की रक्षा पर सब अविनाश अवलम्बित हैं ।
Essence
सोमरक्षा द्वारा मैं 'इन्द्र' आदि शब्दों से सूचित गुणों को अपने में धारण करूँ ।
Subject
अविनाशक' सोम