Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 992

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
या꣢ वा꣣ꣳ स꣡न्ति꣢ पुरु꣣स्पृ꣡हो꣢ नि꣣यु꣡तो꣢ दा꣣शु꣡षे꣣ नरा । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ ता꣢भि꣣रा꣡ ग꣢तम् ॥९९२॥

याः । वा꣣म् । स꣡न्ति꣢꣯ । पु꣣रुस्पृ꣡हः꣢ । पु꣣रु । स्पृ꣡हः꣢꣯ । नि꣣यु꣡तः꣢ । नि꣣ । यु꣡तः꣢꣯ । दा꣣शु꣡षे꣢ । न꣣रा । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । ता꣡भिः꣢꣯ । आ । ग꣣तम् ॥९९२॥

Mantra without Swara
या वाꣳ सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा । इन्द्राग्नी ताभिरा गतम् ॥

याः । वाम् । सन्ति । पुरुस्पृहः । पुरु । स्पृहः । नियुतः । नि । युतः । दाशुषे । नरा । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । ताभिः । आ । गतम् ॥९९२॥

Samveda - Mantra Number : 992
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) = प्राणापान-शक्तियो! (या) = जो (वाम्) = आपकी (पुरुस्पृहः) = अत्यन्त स्पृहणीय (नियुतः) = मिश्रण व अमिश्रण की शक्तियाँ सन्ति हैं, [प्राण के द्वारा शरीर के साथ बल का मिश्रण होता है और अपान द्वारा मस्तिष्क से अज्ञानान्धकार का निवारण होता है] । इन शक्तियों के द्वारा आप (नरा) = मनुष्यों को उन्नति-पथ पर ले-चलते हो । आप (ताभिः) = उन शक्तियों के साथ (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिए, आपके प्रति अपना समर्पण करनेवाले व्यक्ति के लिए (आगतम्) = प्राप्त होओ । जो भी व्यक्ति प्राणसाधना करता है, उसे प्राणापान उत्तमता से जोड़ते हैं और न्यूनताओं से पृथक् करते हैं ।
Essence
प्राणापान की साधना हमें भद्र से जोड़े और अभद्र से पृथक् करे ।
Subject
भद्र से संयोग, अभद्र से वियोग